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जानें, भारतीय महिलाओं के सबसे पसंदीदा त्यौहार करवा-चौथ की कहानी
हमारे देश की सबसे खूबसूरत बात है इसकी संपन्न और अनोखी संस्कृति। चाहे कोई भी त्यौहार हो, हमारे देश में वो पूरे उत्साह से मनाया जाता है।
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नवरात्री से लेकर धनतेरस, गुड़ी-पाड़वा से लेकर करवा-चौथ, भारत के लोग हर छोटा-बड़ा त्यौहार दिल खोल कर मनाते हैं। त्योहारों की बात चली है तो सबसे करीबी त्यौहार का ख्याल आता है। करवा-चौथ।

मुख्य रूप से पंजाबियों और सिखों का ये त्यौहार महिलाएं अपने पति की सुरक्षा, स्वस्थ और लम्बी उम्र के लिए मनाती हैं। करवा-चौथ शब्द दो अलग-अलग शब्दों से बना है।
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करवा यानी कलश और चौथ का मतलब चौथा। चूंकि इस त्यौहार में कलश का ख़ास महत्व होता है और यह कार्तिक मास की पूर्णिमा के चौथे दिन मनाया जाता है, इस त्यौहार का नाम करवा-चौथ पड़ गया।

आजकल यह त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। फिल्मों और टीवी सीरियलों में भी यह त्यौहार खूब बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है। पर ये करवा-चौथ आखिर शुरू कब और कैसे हुआ था?
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इस त्यौहार की शुरुआत भारत के उत्तर-पश्चिम इलाके में हुई थी। ये वो समय था जब देश मुग़ल हमारे देश पर आक्रमण कर रहे थे। हिन्दू राजा और सिपाही देश को मुग़लों से बचाने के लिए युद्ध लड़ रहे थे। पति युद्धभूमि में होते थे और पत्नियाँ और बच्चे घर पर उनकी सलामती की प्रार्थना करते रहते थे।

शायद अपने दिमाग और मन को व्यस्त रखने के लिए महिलाओं ने ये तरीका निकाला था। औरतें एक जगह इकट्ठी होती थीं, जहां मिलजुल कर वो ख़ास पकवान बनाती थीं, खूब सजती थीं, अपने सबसे अच्छे वाले कपड़े पहनती थीं और अपनी ही जैसी बाकी औरतों के साथ अच्छा वक्त बिताती थीं। यह भी पढ़ें- करवा चौथ व्रत के लिये जरुरी सामग्री

जिन औरतों के पति युद्धभूमि में गए होते थे, वो भी बाकी औरतों के साथ इकट्ठी होती थीं। वो भी सबके साथ मिलकर सबके पतियों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती थीं। उपवास भी इसीलिए रखा जाता था ताकि उनके पति शत्रु के आक्रमण से सुरक्षित वापस लौटें।

इसके अलावा इस त्यौहार की शुरुआत के बारे में एक और कहानी बहुत प्रचलित है। बहुत सालों पहले, जब बाल-विवाह खुलेआम चलन में था। छोटी बच्चियों की शादियाँ करवा दी जाती थीं।
अक्सर उसके सास-ससुर भी उसके नए घर से बहुत दूर रहते थे। इस वजह से उस लड़कियों के पास बातें करने और अपना सुख-दुःख बांटनें के लिए कोई नहीं होता था। उस वक़्त मोबाइल फ़ोन तो थे नहीं।

दूर गाँव में बातें कर पाने जैसी बातें कोई सोच भी नहीं सकता था। इस समस्या से निपटने के लिए एक रास्ता निकाला गया। तय हुआ कि ब्याह के बाद लड़की जब ससुराल आयेगी, यहां वो एक नई सहेली बनाएगी। ये नई सहेली उसकी मुंहबोली बहन होगी।
ये दोनों हर रोज़ बातें करेंगी। एक दूसरे से अपना सुख-दुःख बांटेंगी और एक-दूसरे की हर संभव सहायता भी करेंगी। यह करवा-चौथ का त्यौहार उन दोनों की दोस्तीं का प्रतीक है।

करवा-चौथ के एक दिन पहले ये औरतें मिटटी के कलश लायेंगी, उनको रंगेंगी, उसमें टॉफी, चूड़ियाँ, पहनने के कुछ सामान, मेकअप का सामान, और फीते वगैरह रखती हैं और अपनी मुंहबोली बहन को भेंट करती हैं।
चाहे शुरुआत कुछ भी रही हो, ये तो सच है कि करवा-चौथ महिलाओं का त्यौहार है जहां महिलाएं एक दूसरे के साथ खुशनुमा वक़्त बिताती हैं, अपनी दोस्ती को और पक्का करती हैं, साथ ही अपने-अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना भी करती हैं।

पूरे दिन उपवास रखना, पूजा की थाली को गोले में एक-दूसरे को पास करना, चाँद को देखकर ही उपवास खोलना, ये सारी रस्में आज भी उतने ही उत्साह से निभाई जाती हैं।

इसके अलावा पौराणिक कथाओं में भी करवा-चौथ की झलक दिखती है जब सावित्री अपने पति सत्यवान के लिए और द्रौपदी पांडवों की लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं। यह भी पढ़ें- चौकाने वाले खुलासे: द्रौपदी के पांच पति क्यों थे?

इसी तरह कुछ और त्यौहार हैं जैसे छतीसगढ़, झारखंड, मध्य-प्रदेश और बिहार में मनाया जाने वाला छठ, सिंध में तीज, जो महिलायें अपने पति की सुरक्षा के लिए मनाती हैं।



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