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जितिया व्रत में क्यों खाती हैं माएं इस दिन मछली और शाकाहारी महिलाएं क्या खाती हैं? जानें मान्यता
Why Fish is Eaten Before Jitiya Vrat : जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में माताओं द्वारा रखा जाता है। इसका उद्देश्य संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना है। यह व्रत भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को रखा जाता है और इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें महिलाएं बिना पानी पिए पूरे दिन निर्जल उपवास करती हैं।
जितिया व्रत से जुड़ी परंपराओं में एक खास रिवाज है - व्रत शुरू होने से एक दिन पहले मछली और चावल (माछ-भात) का सेवन करना। यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर धार्मिक उपवास से पहले मछली खाने की परंपरा क्यों जुड़ी है? और जो महिलाएं शाकाहारी हैं, वे इसकी जगह क्या खाती हैं? आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और सांस्कृतिक रहस्य।

जितिया से पहले मछली क्यों खाई जाती है?
जितिया व्रत की पूर्व संध्या पर मछली खाने की परंपरा कई मान्यताओं और कारणों से जुड़ी हुई है।
शक्ति और सहनशक्ति का स्रोत
यह व्रत अत्यंत कठोर माना जाता है क्योंकि इसमें माताएं पूरे दिन पानी की एक बूंद भी नहीं पीतीं। ऐसे में शरीर को अगले दिन के उपवास को सहने के लिए पहले से पर्याप्त ऊर्जा और पोषण की आवश्यकता होती है। मछली प्रोटीन से भरपूर होती है और चावल कार्बोहाइड्रेट का प्रमुख स्रोत है। इन दोनों का सेवन शरीर को ताकत देता है ताकि व्रत के दिन थकान और कमजोरी कम महसूस हो।
सांस्कृतिक परंपरा का पालन
सदियों से जितिया व्रत से पहले "माछ-भात खाय के उपवास करे के" परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि यदि व्रत से पहले माछ-भात का सेवन न किया जाए, तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यह परंपरा पीढ़ियों से महिलाओं के बीच चली आ रही है और इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।
समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक
कई समुदायों में मछली को शुभ माना गया है। इसे समृद्धि, उर्वरता और सौभाग्य का प्रतीक समझा जाता है। मछली का सेवन करने से व्रत के सफल होने और संतान की रक्षा में आशीर्वाद मिलता है, ऐसी लोक मान्यता है
माछ-भात कब खाया जाता है?
जितिया व्रत से एक दिन पहले, यानी अष्टमी तिथि की रात को माताएं माछ-भात का सेवन करती हैं। यह भोजन आखिरी बार लिया जाता है, क्योंकि अगली सुबह से निर्जल व्रत शुरू हो जाता है। इसके बाद माताएं पूरे दिन भगवान जीवित्पुत्रिका की पूजा कर व्रत करती हैं और नवमी तिथि को पारण करती हैं।
शाकाहारी महिलाएं मछली की जगह क्या खाती हैं?
हर महिला मछली नहीं खाती। खासकर जो महिलाएं पूरी तरह शाकाहारी होती हैं, वे इस परंपरा को अपने तरीके से निभाती हैं। परंपरा के अनुसार, शाकाहारी महिलाओं के लिए कर्मी का साग और नोनी का साग मछली के विकल्प के रूप में माना गया है।
नोनी का साग
इसे मछली के समान महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि अगर शाकाहारी महिलाएं मछली की जगह नोनी का साग खाकर उपवास शुरू करती हैं, तो उन्हें भी उतना ही पुण्य और फल प्राप्त होता है।
कर्मी का साग
यह पौष्टिक और पचने में हल्का होता है। शाकाहारी परिवारों में जितिया से पहले के भोजन में कर्मी या नोनी के साग को विशेष रूप से पकाया जाता है।
इस प्रकार शाकाहारी महिलाएं भी परंपरा का पालन करती हैं और धार्मिक आस्था के साथ व्रत रखती हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण
धर्मग्रंथों और लोककथाओं में जितिया व्रत को संतान के जीवन से जोड़ा गया है। मछली या उसके विकल्प के रूप में नोनी का साग खाने का महत्व इसीलिए बताया गया है ताकि व्रती माताएं शारीरिक और मानसिक रूप से व्रत के कठिन नियमों को निभाने के लिए तैयार हो सकें। साथ ही यह भी माना जाता है कि यह परंपरा मातृत्व, जीवनदायिनी शक्ति और पीढ़ियों की निरंतरता का प्रतीक है।



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