फादर्स डे स्पेशल: एक पिता की मुह‍िम जिसने मातम को हरियाली में बदला, अब विदेशों तक गूंज रही है इसकी मिसाल

Fathers Day 2025 Special : राजस्थान के राजसमंद जिले से करीब 15 किलोमीटर दूर बसा एक गांव पिपलांत्री। एक समय था, जब इस गांव में बेटी का जन्म पर मायूसी सी छा जाती थी, लेकिन आज वही गांव बेटियों के जन्म पर जश्न मनाता है, वो भी पेड़ लगाकर, प्रकृति को अपनाकर, जीवन को संजोकर। इस बदलाव की शुरुआत हुई एक पिता के दर्द और प्रेम से। उस पिता का नाम है श्याम सुंदर पालीवाल, जिन्होंने अपनी बेटी की याद में जो बीज बोया, उसने पूरे गांव को हरा-भरा कर दिया।

साल 2007 की बात है। पालीवाल की 16 साल की बेटी, बीमारी के चलते अचानक दुनिया छोड़ गई। एक पिता के लिए इससे बड़ा आघात क्या हो सकता है? लेकिन श्याम सुंदर ने अपने दर्द को एक मुह‍िम में बदल दिया। उन्होंने बेटी की याद में एक पेड़ लगाया। उस पेड़ को वे खुद सींचते, उसका हर पत्ता उनकी बेटी की मुस्कान जैसा लगता। शायद यहीं से जन्म हुआ एक ऐसे विचार का, जो आगे चलकर पूरे देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मिसाल बन गया।

Fathers Day 2025 Piplantri s Shyam Sunder Paliwal A Father Who Turned His Daughter s Memory into a Green Legacy

बेटी जन्म के पर 111 पेड़ लगाकर मनाते हैं खुशियां

पालीवाल ने तय किया अब जब भी उनके गांव में कोई बेटी जन्म लेगी, 111 पेड़ लगाए जाएंगे। शुरुआत में लोगों ने इसे भावुकता में उठाया कदम माना, लेकिन धीरे-धीरे यह एक मजबूत परंपरा बन गई। गांव के लोग खुद बेटियों के नाम पर पेड़ लगाते हैं और उनकी देखभाल भी करते हैं। ये सिर्फ पेड़ नहीं हैं, ये हर बेटी के भविष्य के लिए आशा के प्रतीक बन गए हैं।

एक पिता की यही संवेदनशीलता पिपलांत्री को एक आदर्श गांव में बदलने का कारण बनी। बेटी के जन्म पर न सिर्फ पेड़ लगाए जाते हैं, बल्कि गांव वाले चंदा इकट्ठा कर बेटी के नाम डाकघर में फिक्स डिपॉजिट भी करवाते हैं, ताकि जब वो बड़ी हो, तो उसका भविष्य सुरक्षित हो। यह सब उस एक पिता के कारण संभव हो पाया, जिसने अपनी बेटी को खोने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी।

अपने मुहीम से गांव की कर दी कायापलट

श्याम सुंदर पालीवाल ने सरपंच बनकर अपने गांव के लिए इतना कुछ किया कि सरकार ने भी उनकी योजनाओं को देश भर में लागू करने का निर्णय लिया। जल संरक्षण के लिए उन्होंने एनीकट बनवाए, गांव के स्कूलों का जीर्णोद्धार कराया और जैविक खेती को बढ़ावा दिया। कभी जिस गांव में पानी के लिए 500 फीट खुदाई करनी पड़ती थी, वहां आज प्राकृतिक झरने बहते हैं।

फादर्स डे पर जब हम अपने पिता को याद करते हैं, उनके संघर्ष और प्रेम को महसूस करते हैं, तो श्याम सुंदर पालीवाल जैसे पिता का ज़िक्र करना जरूरी हो जाता है। उन्होंने साबित कर दिया कि एक पिता का प्यार सिर्फ अपने बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि समाज को भी बदलने की ताकत रखता है।

पद्मश्री से सम्‍मानित हो चुके हैं श्याम सुंदर पालीवाल

पालीवाल को उनके कामों के लिए कई पुरस्कार मिले। साल 2007 में गांव को खुले में शौच से मुक्त कराने के लिए उन्हें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से स्वच्छता पुरस्कार मिला। और 2021 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। आज पिपलांत्री की कहानी डेनमार्क के स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है। यूएन भी श्‍याम सुंदर के पिपलांत्री मॉडल की तारीफ कर चुका है।

हर बेटी में अपनी बेटी देखते हैं श्‍याम सुंदर

श्याम सुंदर कहते हैं, "मैंने अपनी बेटी को खोया जरूर है, लेकिन हर उस बेटी में मेरी बेटी का अंश है, जिसके नाम पर गांव में पेड़ लगे हैं। जब वो हँसती हैं, स्कूल जाती हैं, तो मुझे लगता है मेरी बेटी अब भी मेरे साथ है।"

फादर्स डे पर यह कहानी सिर्फ एक पिता की नहीं, बल्कि उस अडिग प्रेम, त्याग और समर्पण की है, जो हर पिता के भीतर होता है। वो जो हर दर्द को छुपा लेता है, हर सपने को बच्चों के नाम कर देता है और अपने आंसुओं को मुस्कान में बदल देता है, क्योंकि वो "पापा" है।

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