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क्या पुरुष नागा की तरह रहती हैं निर्वस्र महिला नागा साधु, माहवारी आने पर क्या करती हैं?
Female Naga Sadhus Interesting Facts : हर 12 साल में आयोजित होने वाला महाकुंभ का आयोजन इस बार 13 जनवरी 2025, सोमवार को शुरू होगा और 26 फरवरी 2025, बुधवार को महाशिवरात्रि के दिन इसका समापन होगा। महाकुंभ में नागा साधुओं का जमावड़ा लगता है, और शाही स्नान की शुरुआत भी वे ही करते हैं। पुरुष नागा साधुओं का आना तो एक परंपरा है, लेकिन महिला नागा साधुओं का महाकुंभ में आना एक विशेष और दुर्लभ घटना मानी जाती है।
नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया के बारे में सभी ने सुना होगा, लेकिन महिला नागा साधुओं का जीवन अनोखा होता है। महिला नागा साधुओं के जीवन मे यह सवाल उठता है कि क्या वे भी दिगंबर रहती हैं और पीरियड्स के दौरान क्या करती हैं। आइए जानते हैं महिला नागा साधुओं के जीवन से जुडी दिलचस्प बातें-

कैसे बनती है महिला नागा साधु?
महिला नागा साधु बनने के लिए महिलाओं को कठिन तप और साधना से गुजरना पड़ता है। वे गुफाओं, जंगलों, पहाड़ों में रहकर भगवान की भक्ति करती हैं और सख्त ब्रह्मचर्य का पालन करती हैं, जो 6 से 12 साल तक चलता है। इसके बाद ही गुरु उन्हें नागा साधु बनने की अनुमति देते हैं। दीक्षा लेने से पहले उनका सिर मुंडवाया जाता है और उन्हें तपस्या के दौरान हर पहलू पर आंका जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे इस कठिन रास्ते पर चल सकती हैं।
पीरियड के दौरान कैसे करती हैं मैनेज?
महिला नागा का दिनचर्या पुरुष नागा साधुओं से अलग होती हैं, क्योंकि वे दिगंबर नहीं रहतीं। महिला नागा साधु हमेशा केसरिया रंग के वस्त्र धारण करती हैं, जो सिला हुआ नहीं होता। इस कारण उन्हें पीरियड्स के दौरान किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।
क्या पुरुषों की तरह निर्वस्र रहती है महिला नागा साधु?
पुरुष नागा साधुओं की तरह महिला साधु नग्न नहीं रहतीं, बल्कि वे अपने तन पर गेरूआ रंग का वस्त्र लपेटे रहती हैं। जिसे "गंती" कहते हैं, जो सिला हुआ नहीं होता। महिला नागा साधुओं को एक ही वस्त्र पहनने की अनुमति होती है। साथ ही, वे तिलक लगाती हैं और जटाएं धारण करती हैं। बिना वस्त्रों के शाही स्नान में नहाना इन अखाड़ों में प्रतिबंधित होता है। इसके बजाय, महिला नागा साधु गेरूआ वस्त्र पहनकर ही स्नान करती हैं। अखाड़ों का मानना है कि महिलाओं का नग्न रहना भारतीय संस्कृति का उल्लंघन होगा, और इसे समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खुद का करना होता है पिंडदान
महिला नागा साधु बनने से पहले महिला संन्यासिनी को सभी सांसारिक बंधन तोड़ने पड़ते हैं। इसके लिए उसे जीते जी अपना पिंडदान करना पड़ता है, यानी कि वह अपनी पुरानी जिंदगी को खत्म करके एक नए जीवन में प्रवेश करती है। हिंदू धर्म में पिंडदान मरने के बाद परिवारजन करते हैं। महिला नागा साधु हमेशा दुनिया से दूर एकांत में जीवन बिताती हैं और केवल कुंभ जैसे खास अवसरों पर ही पवित्र नदियों में स्नान करने के लिए सामने आती हैं। उन्हें पुरुष नागा साधुओं की तरह सम्मान प्राप्त होता है और उन्हें "माता" कहकर संबोधित किया जाता है।
नेपाल से आती हैं ज्यादात्तर महिला नागा साध
माना जाता है कि जूना अखाड़े में सबसे ज्यादा महिला नागा साधु हैं। इस अखाड़े में अधिकांश महिला साधु नेपाल से आती हैं। इसकी वजह यह है कि नेपाल में ऊंची जाति की महिलाओं को दोबारा शादी समाज में स्वीकार नहीं करता, और ऐसे में ये महिलाएं घर लौटने के बजाय साधु बनने का रास्ता अपनाती हैं। महाकुंभ के दौरान इन महिला साधुओं का योगदान विशेष होता है। इसके अलावा, प्रयाग में संपन्न हुए महाकुंभ में केवल देशी महिलाएं ही नहीं, बल्कि कुछ विदेशी महिलाएं भी महिला नागा साधु के रूप में शामिल होती है।



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