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राजस्थान के इस मंदिर में भक्तों के पार्टनर बनते हैं भगवान, बनता है एग्रीमेंट, प्रोफिट में कमाते हैं करोड़ों
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में का सांवलिया सेठ मंदिर देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भक्त भगवान के साथ पार्टनरशिप करते हैं। बाकायदा यहां लिखित में एग्रीमेंट होता है। मुनाफा होने पर 20 फीसदी तक हिस्सेदारी भगवान को चढ़ाते हैं। बिजनसमैन से लेकर किसानों तक यहां तक तस्कर के साथ भी भगवान की पार्टनरशिप हैं। विदेशों में रहने वाले कई बिजनसमैन के साथ भी उनकी पार्टनरशिप हैं।
आज जन्माष्टमी के मौके पर हम आपको सेठों के सेठ सावंलिया सेठ के बारे में बताएंगे कि कैसे वो साधारण से गिरधर गोपाल से सेठ बन गए।

कैसे बने सांवलिया सेठ?
मान्यता के अनुसार नरसी भगत नाम के संत थे वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उनका बेटा सांवलादास था। जिसकी आसमायिक ही मुत्यु हो गई। इसी दौरान नरसी की बेटी नानीबाई का मायरा होना तय हुआ। भक्त नरसी बिना किसी सामान के नानी बाई के ससुराल पहुंच जाते हैं। और सुसराल वाले उन्हें अपनी डिमांड बता देते हैं। इसके अलावा नरसी भगत की स्थिति को देखकर उनके ससुराल वाले उन्हें ताना देते हैं, जिससे दुखी होकर नानी बाई कहती है, जब आपके पास मायरे के सामान नहीं था तो आप वहां गए ही क्यों?
यह देख नरसी भगत भगवान कृष्ण को याद करते हैं और कहते हैं कि आ तो मायरा भररन तुम्हीं को आना होगा। इसके बाद भगवान कृष्या स्वयं द्वारिका से अपनी रानियों संग मायरा भरने आते हैं और नानी बाई का मायरा भरते हैं। यहीं से उनका नाम सांवला सेठ हो जाता है। क्योंकि नरसी भगत के बेटे का नाम सांवलादास होता हैं। आज भी नानीबाई का मायरा देशभर में बहुत मशहूर हैं।
मीरा के गिरधर गोपाल बनें सांवलिया सेठ
चित्तौडगढ़ के मंडफिया स्थित श्री सांवलिया सेठ का मंदिर करीब 450 साल पुराना है। कथा के मुताबिक क्षेत्र में एक ग्वाला था जिसे सपने में भगवान सांवलिया सेठ आए और फिर वह गाय चराने जंगल मे गया तो उसे तीन प्रतिमाएं मिली जिसमें एक वहीं स्थापित की, एक भादसोड़ा और एक मंडफिया जो सांवलिया सेठ है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है, जिनकी वह पूजा किया करती थी।
कैसे शुरू हुई पार्टनरशिप?
लगभग 100 से 150 साल पुरानी बात है कि हरियाली अमावस्या के दिन अन्नकूट महोत्सव चल रहा था उसी समय मालपुआ बनाते हुए घी कम पड़ गया। सभी ने सांवलिया सेठ से इज्जत बचाने की प्रार्थना की तभी एक वृद्ध ने कहा कि पास के कुएं से पानी लेकर आओ और घी बनाओ। इसके बाद कडाही में जैसे ही पानी डाला गया वो घी बन गया, सब हैरान हो गए इसके बाद वो वृद्ध वहां से गायब हो गया। सब कहते हैं वो ही सांवलिया सेठ थे। इसके बाद से ही सबने अपने हर सुख-दुख में सांवलिया सेठ को याद करना शुरू कर दिया यहीं से वो सबके पार्टनर बनने लगें।
चढ़ावे में आता है इतना कुछ
सावंलिया सेठ को सेठों का सेठ बोला जाए तो इसे अतिश्योक्ति नहीं कहेंगे। कई लोगों को मालदार बना चुके सावंलिया सेठ हर साल प्रोफिट में करोड़ों कमाते हैं। उन्हें प्रोफिट बोले या चढ़ावे में काफी कुछ हर साल चढ़ता है। सावंलिया सेठ को चांदी की हथकड़ी, पंखा, पलंग, जेसीबी, कंगन, अफीम का पौधा, जीप, सोने के एक किलो बिस्किट, डॉलर्स, पाउंड, दिनार, रियाल का चढ़ावा चढ़ चुका है। खेती करने वाले किसान अनाज की उपज का एक हिस्सा चढ़ाते हैं। वहीं अफीम की तस्करी करने वाले काला सोना कहे जाने वाली अफीम का चढ़ावा चढ़ाते हैं।



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