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Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध के वो 3 गुमनाम नायक, जिन्होंने पाकिस्तान को चटाई थी धूल
3 Unsung Heroes Of The 1999 Kargil War: इस साल कारगिल युद्ध को 24 साल पूरे हो रहे हैं। जब भी हम इस दिन को याद करते हैं, तो हमारी आंखें उन वीरों के लिए नम हो जाती हैं। जिन्होंने अपनी शहादत से देकर इस मिट्टी पर आंच नहीं आने दी।
हम ऐसे कई कारगिल हीरो के बारे में पढ़ते या सुनते आ रहे हैं, जिनके बलिदान को हम कभी नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। विक्रम बत्रा, मनोज पांडे, विजयंत थापर, अनुज नैय्यर और भी इस लिस्ट में ऐसे कई नाम शामिल हैं, जिनकी नामों की हर साल गौरवगाथा हम सुनते हैं।
लेकिन आज हम आपको ऐसे गुमनाम 3 हीरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके शायद आपने नाम तक नहीं सुने होंगे, लेकिन इन्होंने करगिल युद्ध की दिशा मोड़ दी थी। इनके बलिदान के बगैर ये जंग जीतना मुश्किल था।

कैप्टन जिंटू गोगोई
कैप्टन जिंटू गोगोई का जन्म असम के गोलाघाट जिले के एक छोटे से शहर खुमताई में हुआ था। कैप्टन जिंटू गोगोई को गढ़वाल राइफल्स के 17 गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था। जब भारत पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा, तो उनकी 12 दिन पहले ही सगाई हुई थी। सगाई के 12 दिन बाद ही उन्हें अपनी यूनिट में शामिल होने के लिए छुट्टी से वापस बुला लिया गया।
29 जून की रात कैप्टन गोगोई और उनके सैनिकों को काला पत्थर से दुश्मन को हटाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। यह इलाका बटालिक क्षेत्र में नियंत्रण रेखा के पास था। मिशन तक पहुँचने के लिए कैप्टन गोगोई और उनकी टुकड़ी को कठिन चढ़ाई करनी थी। भारी गोलीबारी के साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन गोगोई की टुकड़ी को सभी दिशाओं से घेर लिया। कैप्टन गोगोई की इस साहसी कार्रवाई में पाकिस्तान के 2 सैनिक मारे गए। साथ ही इस हमले में कई पाकिस्तानी सैनिक घायल हो गए।
हालांकि दोनों तरफ से हुई गोलीबारी के दौरान कैप्टन गोगोई भी घायल हो गए थे। उनके सोलर प्लेक्सस में मशीन गन से जोरदार धमाका हुआ लेकिन उन्होंने तब तक गोलीबारी जारी रखी जब तक कि वह गिर नहीं गए। बाद में गंभीर चोटों के कारण युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए। इस युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए अपने प्राणों का परित्याग करने के लिए कैप्टन गोगोई को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफोर्ड नोंग्रुम
मेघालय के शिलांग के रहने वाले लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफोर्ड नोंग्रम को 5 सितम्बर 1997 को जम्मू कश्मीर लाइट इन्फैंट्री की 12 वीं बटालियन में नियुक्ति मिली। आपको बता दें कि कारगिल युद्ध शुरू होने पर लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफोर्ड नोंगरम सिर्फ 24 वर्ष के थे। युद्ध में उनकी बटालियन बटालिक सेक्टर में तैनात थी।
कारगिल युद्ध के दौरान 30 जून, 1999 की रात को, लेफ्टिनेंट नोंग्रुम की यूनिट को बटालिक सेक्टर में प्वाइंट 4812 हासिल करने की जिम्मेदारी दी गई, इस ऑपरेशन में लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफोर्ड नोंग्रम को प्वाइंट 4812 के क्लिफ फीचर पर हमले को अंजाम देने का काम सौंपा गया था। दक्षिण पूर्वी दिशा से खड़ी चोटी पर चढ़ना लगभग असंभव था, लेकिन लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने इस चुनौती को स्वीकार किया। वह दुश्मन बंकरों तक पहुंच कर खड़ी ढलानों पर चढ़ने में कामयाब हुए। लेकिन पाकिस्तानी घुसपैठियों के कारण लेफ्टिनेंट नोंग्रुम और उनकी बटालियन को भारी मोर्टार और गन फायर के रूप में दुश्मन के मजबूत विरोध का सामना करना पड़ा।
लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने दुश्मनों का सामना करने के लिए दुश्मन के बंकरों पर फायरिंग और ग्रेनेड दागे और बंकरों में छिपे दुश्मन के 6 सैनिकों को मार गिराया, लेकिन उन्हें फेंकते समय लेफ्टिनेंट नोंग्रुम को कई गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल, लेफ्टिनेंट नोंग्रुम बचे हुए बंकर में मशीन गन छीनने के प्रयास में पाकिस्तानी सैनिकों के साथ हाथ से हाथ मिलाकर अपनी अंतिम सांस तक लड़ते रहें।
इन्हें मरणोपरांत 15 अगस्त, 1999 को राष्ट्र के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार, महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

स्क्वाड्रन लीड अजय आहूजा
कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में कैप्टन नचिकेता भी पाकिस्तान के कब्जे में आ गए थे, हालांकि उन्हें 8 दिन बाद वापस कर दिया गया था, लेकिन नचिकेता को ढूंढने गए एक और पायलट पाकिस्तान की सीमा में दाखिल हुए थे, जो नचिकेता की तरह सही-सलामत भारत नहीं लौट पाए। भारतीय एयर फोर्स के वीर पायलट स्क्वाड्रन लीडर
अजय आहूजा के लिए वो दिन शहादत का साबित हुआ। 27 मई 1999 में दुश्मनों के ठिकानों को देखने के लिए 2 एयरक्राफ्ट उड़ाने की योजना बनाई गई। उड़ान भरने के बाद मुंथो ढालो के पास नचिकेता के विमान मिग-27 के क्रैश होने की जानकारी मिली, पता चला कि नचिकेता ने विमान से इजेक्ट कर लिया है। जानकारी मिलते ही अजय ने नचिकेता को ढूंढने के लिए निकल गए। पाकिस्तान की फौज जमीन से लगातार आसमान में मिसाइल दाग रही थी। पाकिस्तान की सीमा में उड़ान भर रहे आहूजा दुश्मन के निशाने पर आ गए, पाकिस्तान ने उनके विमान पर मिसाइल दागी, उन्होंने फिर भी विमान उड़ाने की कोशिश की, लेकिन इंजन में आग लगने के कारण उन्हें इजेक्ट होना पड़ा। 28 मई 1999 के दिन भारतीय सेना को आहूजा का शव सौंप दिया गया। उनके शरीर में गोलियों के 2 निशान थे। मरणोपरांत स्क्वाड्रन लीडर आहूजा को 15 अगस्त 1999 को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। पाकिस्तान का दावा था कि प्लेन क्रैश होने के कारण अजय की मौत हुई थी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनका झूठ पकड़ा गया। रिपोर्ट में पाया गया कि आहूजा को नजदीक से गोलियां मारी गई थीं, तीन गंभीर घाव होने की बात भी सामने आई थी।



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