Latest Updates
-
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर घूमने के लिए बेस्ट हैं ये 7 जगहें, दिखेगा कृष्ण भक्ति का खास रंग -
Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी पर इन आसान तरीकों से सजाएं अपना पूजा घर, यहां देखें 10 डेकोरेशन आइडियाज -
World Coconut Day 2026: सूखा या ताजा नारियल, सेहत के लिए कौन सा ज्यादा फायदेमंद? जानें दोनों में अंतर -
Hal Shashthi Vrat Katha: हरछठ यानी ललही छठ व्रत में जरूर पढ़ें ये कथा, नहीं तो अधूरी मानी जाएगी पूजा -
Hal Shashti 2026 Wishes: मां की ममता...ललही छठ पर प्रियजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
Krishna Janmashtami 2026: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब है, 4 या 5 सितंबर? जानें सही तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त -
Badshah Divorce: 5 महीने में ही टूट गई बादशाह की दूसरी शादी, ईशा रिखी संग तलाक का किया ऐलान -
National Nutrition Week 2026: क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय पोषण सप्ताह? जानें इसका इतिहास और महत्व -
September 2026 Vrat Tyohar List: सितंबर में आएंगे जन्माष्टमी समेत कई प्रमुख व्रत-त्योहार, देखें पूरी लिस्ट -
जन्माष्टमी 2026: 3 या 4 सितंबर? कन्फ्यूजन छोड़ें, जानें सही तारीख और निशिता पूजा का शुभ मुहूर्त
विसर्जन से पहले क्यों इस मस्जिद पर आकर रुकता है लालबागचा राजा का रथ, जानें वजह
ganesh visarjan lalbaugcha raja : मुंबई में गणेशोत्सव का अंतिम दिन, अनंत चतुर्दशी, भावनाओं और आस्था का संगम लेकर आता है। इस दिन लाखों की संख्या में गणेशभक्त सड़कों पर उतरते हैं और विभिन्न गणेश मंडलों की भव्य शोभायात्राओं में शामिल होते हैं। इन्हीं में सबसे प्रसिद्ध और चर्चित शोभायात्रा है लालबागचा राजा की, जिसे देखने के लिए पूरे मुंबई और बाहर से भी लोग उमड़ते हैं। यह शोभायात्रा गिरगांव चौपाटी तक जाती है और विसर्जन से पहले पूरे शहर का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है।
लेकिन इस यात्रा को खास बनाने वाली बात सिर्फ इसकी भव्यता नहीं है, बल्कि वह परंपरा है जो दशकों से हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की मिसाल बनकर सामने आती है।

हिंदुस्तानी मस्जिद के सामने क्यों थमता है जुलूस?
लालबागचा राजा का जुलूस जब भायखला इलाके से गुजरता है तो वहां स्थित 125 साल पुरानी चिश्ती हिंदुस्तानी मस्जिद के सामने रथ कुछ देर के लिए रुकता है। यह मुंबई का एकमात्र ऐसा गणपति जुलूस है जो किसी मस्जिद के सामने रुकता है। यहां मुस्लिम समुदाय गणपति बाप्पा का स्वागत मिठाइयों और फूलों से करता है। इस दौरान दोनों समुदाय के लोग मिलकर खुशियां बांटते हैं और एक-दूसरे का सत्कार करते हैं।
कब से शुरू हुई परंपरा?
मीडिया रिपोर्ट्स और इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा 1975 से शुरू हुई थी। तब से हर साल लालबागचा राजा का रथ मस्जिद के सामने रुकता है और यह परंपरा निरंतर जारी है। यह सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है।
नमाज़ के समय ठहर जाती है शोभायात्रा
इस परंपरा की सबसे सुंदर बात यह है कि यदि लालबागचा राजा का रथ मस्जिद के सामने नमाज़ के समय पहुँचता है, तो गणपति मंडल अपना जुलूस रोककर नमाज़ पूरी होने का इंतजार करता है। नमाज़ खत्म होते ही दोनों समुदाय मिलकर गणपति का स्वागत करते हैं और फिर शोभायात्रा आगे बढ़ती है। यह दृश्य न केवल मुंबई बल्कि पूरे भारत में धार्मिक एकता की मिसाल पेश करता है।
लाखों भक्त बनते हैं गवाह
लालबागचा राजा को नवसाचा गणपति भी कहा जाता है, यानी ऐसा गणपति जो भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करता है। यही कारण है कि हर साल करोड़ों भक्त बप्पा के दर्शन के लिए आते हैं। मंडल के अनुसार, विसर्जन दिवस पर ही करीब 15 लाख लोग इस जुलूस का हिस्सा बनते हैं।
लालबागचा राजा मंडल का इतिहास
लालबागचा राजा का मंडल, जिसे सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल, लालबाग कहा जाता है, की स्थापना 1928 में हुई थी। यह मंडल मुंबई का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय गणेशोत्सव मंडल माना जाता है। गणपति बप्पा की यह मूर्ति "नवसाचा गणपति" के नाम से प्रसिद्ध हुई क्योंकि यहां आकर लोगों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
लालबागचा राजा का हिंदुस्तानी मस्जिद के सामने रुकना सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव का अद्भुत उदाहरण है। जब दोनों समुदाय मिलकर इस पर्व को मनाते हैं, तो यह संदेश जाता है कि आस्था का असली रूप प्यार और भाईचारा है, न कि विभाजन।
क्यों है यह परंपरा खास?
आज जब समाज में धर्म और राजनीति को लेकर विभाजन की बातें होती हैं, तब यह परंपरा यह याद दिलाती है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और एकता में है। लालबागचा राजा का मस्जिद के सामने रुकना और मुस्लिम समाज का बप्पा का स्वागत करना, इस भाईचारे की जीती-जागती मिसाल है।



Click it and Unblock the Notifications