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इस मंदिर में महिलाओं की तरह 16 शृंगार करने के बाद ही पुरुषों को मिलता है प्रवेश, जानिए ऐसा क्यूं?
केरल राज्य में स्थित इस मंदिर में प्रतिवर्ष हजारों किशोर, युवक और पुरुष इस मंदिर में महिलाओं की तरह 16 शृंगार करके पूजा करने आते हैं, जानते है क्यूं?
हमारे देश में कई तरह के चमत्कारी मंदिर हैं, जिनके बारे में आए दिन हम कुछ न कुछ नई काहानियां सुनने को मिलती है। हर मंदिर के अलग नियम कायदे होते हैं। हर मंदिरमें पूजा अर्चना करने के तौर तरीके भी अलग अलग होती है।
देश में कई मंदिरों में जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है तो वहीं कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जहां पुरुषों का आना भी मना है। लेकिन आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है। जहां पुरुषों को महिलाओं की तरह 16 शृंगार करके देवी को प्रसन्न करना होता है।
यकीन नहीं हो रहा होगा न कि ये कौनसा मंदिर है और ऐसी पूजा अर्चना कहां होती है। ये मंदिर दक्षिण भारत के केरल राज्य में स्थित है। आइए जानते है कि आखिर क्यों इस मंदिर में पुरुष महिलाओं की तरह 16 शृंगार करके पूजा करने आते हैं?

केरल में है ये मंदिर
केरल के कोल्लम जिले से 13 किलोमीटर कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर में देवी मां की पूजा की परम्परा वर्षों से चली आ रही है। हर साल इस मंदिर में एक उत्सव का आयोजन होता है। इस मंदिर में पूजा करने से पहले पुरुषों को भी महिलाओं की तरह सोलह श्रृंगार करना आवश्यक होता है।

चाम्याविलक्कू फेस्टिवल में धरते है महिला का रुप
हर साल इस मंदिर में चाम्याविलक्कू फेस्टिवल मनाया जाता है। ये फेस्टिवल 10 से 11 दिन तक मनाया जाता है। जिसमें आखिरी के दो दिन में यहां पुरुषों को महिलाओं का रूप धारण करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश मिलता है। महिलाओं का रूप धारण करने का मतलब सिर्फ कपड़े बदलना ही नहीं है, बल्कि उन्हें महिलाओं की तरह पूरे सोलह श्रृंगार भी करने पड़ते है। इसके बाद ही यहां मंदिर में प्रवेश मिलता है।

ये है मान्यता
कहा जाता है कि इस मंदिर में देवी की मूर्ति खुद प्रकट हुई थी। यह केरल का इकलौता मंदिर है, जिसके गर्भगृह के ऊपर छत या कलश नहीं है। मंदिर में सोलह श्रृंगार करने के बाद पुरुष अच्छी नौकरी, हेल्थ, लाइफ पार्टनर और अपनी फैमिली की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।

ये है काहानी
माना जाता है कि सालों पहले इस जगह पर कुछ चरवाहों ने महिलाओं के कपड़े पहनकर पत्थर पर फूल चढ़ाया था। जिसके बाद पत्थर से दिव्य शक्ति निकलने लगी। बाद में इसे एक मंदिर का रूप दे दिया गया।

मार्च-अप्रैल में होता है
ये त्योहार सामान्यता मार्च या अप्रेल के महीने में होता है। जहां पुरुष सजधज कर इस फेस्टिवल में भाग लेते हैं। यहां छोटे बालक अपने अभिभावक के साथ और शादीशुदा आदमी अपनी पत्नी के साथ आते हैं।



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