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महिलाओं के शरीर के बारे में पांच मिथ
ऐतिहासिक रूप से शोध कार्यों में पुरुषों का ज़यादा इस्तमाल होता है। उदाहरणस्वरुप कैंसर में, जो दोनों वर्गों को प्रभावित करता है, इस महत्व्पूर्ण नैदानिक सुनवाई में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होता है। शोधकर्ता बताते हैं कि इसके लिये कई कारण हो सकते हैं जिनमें से बच्चों की देखभाल सम्बन्धी कारण से लेकर शोधकर्ताओं का बच्चे जनने की उम्र में महिलाओं को शोध और परिक्षण से दूर रखने की कोशिश रहती है।
कुछ ऐसे क्षेत्र जिनमें महिलाओं की चिकित्सा सम्बन्धी परेशानी से सम्बंधित शोध में कमी रही है, यह सिर्फ लिंग के आधार पर भेद भाव की बात नहीं है। महिलाओं के हॉर्मोन में उतार चढ़ाव थोड़े जटिल होते हैं और यह मूलभूत खोज को गलत साबित कर सकता है। पर कुछ सालों से महिलाओं पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा है।
फिर भी महिलाओं के शरीर के बारे में कई गलत धारणाएं हैं जो चेतना की मुख्यधारा में फैली हुई हैं।

मिथ: डॉक्टर बता सकता है कि महिला कुंवारी है या नहीं
शोध के बाद पता चला है कि डॉक्टरों के लिए भी ऐसा बता पाना काफी मुश्किल है कि एक महिला कुंवारी है या लैंगिक रूप से सक्रिय है। योनिच्छद में छेद देखकर ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि योनिच्छद में हमेशा छेद होता है।
इंडिआना यूनिवर्सिटी और 'डोंट स्वालो योर गम' किताब के कैरोल के साथ सह रचनाकार डॉक्टर रेचल व्रीमन का कहना है कि जब तक महिला कुंवारी रहती है उसके योनि के उपर योनिच्छद की परत होती है। पर यह सच नहीं है। उन ऐसे मामले में जब योनि के ऊपर योनिच्छिद की परत लगी होती है तो गर्भाशय में मासिक धर्म के समय का खून जम जाता है और इससे कई गम्भीर परेशानियां हो सकती हैं।

मिथ: एंटीबायोटिक खाने से गर्भ निरोधक गोलियां अविश्वसनीय हो जाती हैं
कैरोल का कहना है कि कई चिकित्सक ऐसा भी मानते हैं। गर्भ निरोधक गोलियां सिर्फ एक प्रतिशत समय फेल होती हैं और एंटीबायोटिक खाने के बाद भी इस रेट में कोई बदलाव नहीं आता।
ट्यूबरक्लोसिस के लिए दिया जाने वाला रिफॉम्पिन एक सम्भव अपवाद हो सकता है। रिफॉम्पिन गर्भ निरोधक गोलियों द्वारा प्रेरित उन प्रेगनेंसी को रोकने वाले हॉर्मोन को कम करता है। पर इसका प्रभाव कितना होता है यह अभी पता नहीं है।
कैरोल के अनुसार रिफॉम्पिन पर शोध ने गर्भ निरोध के अफवाह को प्रेरणा दी है और वह मानती हैं कि कभी कभी लोग कुछ केह देते हैं और हट जाते हैं।

मिथ: पुरुष और महिलाओं को समान रूप से नींद की ज़रुरत होती है
बेचैन होकर इधर उधर करवट बदलने से मनोवैज्ञानिक परेशानी तो होती ही है साथ ही इससे उनका इन्सुलिन लेवल और सूजन और जलन भी बढ़ जाता है। 210 लोगों पर 2008 में हुए एक शोध में यह पता चला जिसका प्रतिनिधित्व डूक यूनिवर्सिटी के एडवर्ड सुआरेज़ कर रहे थे।
2007 में वार्वीक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा 6000 सहभागियों पर किए गए शोध में यह पता चला कि एसी महिलाएँ जो रात में पांच से छः घण्टे सोती थीं उन्हें उन महिलाओं के मुकाबले जो सात घन्टे या उससे ज्यादा सोती थीं, उच्च रक्तचाप की परेशानी से गुज़रना पड़ा। पुरुषों में ऐसा नहीं पाया गया। महिलाओं के लिए ज़रूरी है कि वह अपनी घडी को देखकर ही सोयें और जगें

मिथ: रजोनिवृत्ति के समय संभोग करने की इक्षा में भारी गिरावट आती है
बेडरूम में यह बदलाव नहीं आता। 1994 में अमेरिका के एडवर्ड लौमन और उनके सहकर्मी द्वारा यौन आदत के निरिक्षण पर किये गए शोध से यह पता चला कि पचास की उम्र की करीबन आधी महिलाएं महीने में कई बार संभोग करती हैं।
रजोनिवृत्ति और दूसरी परेशानियां एक महिला को संभोग करने से रोक सकती हैं पर व्रीमन के अनुसार रजोनिवृत्ति और संभोग करने की इक्षा में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसलिए अगर आप रजोनिवृत्ति की तरफ बढ़ रही हैं तो आपको संभोग करने से अपने आप को रोकने की ज़रुरत नहीं है।

मिथ: एक महिला मासिक धर्म के समय गर्भ धारण नहीं कर सकती
इंडिआना यूनिवर्सिटी के आरोन कैरोल के अनुसार जो "डोंट स्वालो योर गम" किताब की सह रचनाकार हैं, "ज़्यादातर मासिक धर्म के समय महिला का गर्भधारण नहीं होता पर जब बात गर्भधारण की आती है तो कुछ भी हो सकता है।"
एक बार स्पर्म महिला के अंदर होता है तो वह एक हफ्ते तक अंडे का इंतज़ार करता है। ओवुलेशन एक महिला के मासिक धर्म के समय या उसके तुरंत बाद शुरू हो सकता है और वह स्पर्म फर्टिलाइज़ हो सकता है। कैरोल के अनुसार इस दौरान अगर आप ऐसा सोच रहे हैं कि गर्भधारण नहीं होगा तो ऐसे लोग माता पिटा बन सकते हैं।



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