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भारत देश 200 से अधिक वर्षों तक विदेशी ताकतों, विशेषकर ब्रिटेन के कब्ज़े में रहा। हमारे देश के संसाधन, हमारे लोग, जिंदगियां, देश के सभी मसलें व फैसलें सब कुछ ब्रिटिश साम्राज्य का गुलाम था।
लेकिन भारत के इस गुलामी के इतिहास में कुछ ऐसे वीर योद्धा रहें जिन्होंने विभिन्न तरीकों से भारत की आजादी की अपनी-अपनी लड़ाइयाँ लड़ीं और अंततः 15, अगस्त 1947 को हमारा देश गुलामी के चंगुल से आज़ाद होकर एक स्वतंत्र देश बन पाया।

ऐसे ही वीर योद्धाओं में से तीन ऐसे नाम रहें जिनकी वीर गाथाएं आज भी बच्चों को सुनाई जाती है, और जिनके प्रयासों का ऋणी यह देश सदा सदा रहेगा।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव, ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने आज के दिन ही भारत को एक आज़ाद देश बनाने के उद्देश्य से खुद हंसते-हंसते फांसी की सज़ा स्वीकार की थी।
जानते हैं इन तीन अमर शहीदों की शहीदी दिवस और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके योगदान के बारे में -

क्या है शहीदी दिवस?
23 मार्च 1931 के दिन ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को राजद्रोह और हत्या के मुकदमों में फांसी की सज़ा दी गई थी। इस दिन उन्हें शाम 07:23 बजे फांसी पर चढ़ा दिया गया था। अमीर शहीदों के इस जीवन त्याग के सम्मान में ही हर वर्ष 23 मार्च को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

शहीद भगत सिंह के बारे में रोचक तथ्य
भगत सिंह ने 8 वर्ष की उम्र से ही भारत को आज़ाद कराने के सपने देखने शुरू कर दिए थे। 15 वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया था और अपना जीवन भारत की आज़ादी की लड़ाई में लगा दिया।
वे कम उम्र से पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं का हिस्सा बनें। जब माता पिता ने उनका विवाह कराना चाहा तब वे कानपुर चले गये थे।
वर्ष 1919 में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार ने उनकी सोच पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। काकोरी कांड में स्वतंत्रता सेनानी बिस्मिल की फांसी की सज़ा के बाद वे चंद्रशेख्सर आज़ाद के संगठन 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' से जुड़े।
17 दिसंबर, 1928 को लाहौर में उन्होंने राजगुरु के साथ मिलकर अंग्रेज़ी पुलिस अधीक्षक जेपी संदेर्स की गोली मारकर हत्या की। इसके साथ ही अप्रैल 1929 में उन्होंने अंग्रेजों का ध्यान भारतीयों की समस्या की ओर लाने के लिए दिल्ली स्थित भारत की तत्कालीन सेंट्रल असेम्बली में बम के साथ साथ पर्चे फेंके। वहीं पर उनको गिरफ्तार किया गया।
क्रांतिकारी गतिविधियों के अलावा उनको पढ़ने और लिखने में भी काफी रूचि थी। जेल के अपने समय के दौरान कुछ बेहतरीन लेख लिखें जिन्हें आज भी उनकी विचारों को समझने के लिए पढ़ा जाता है।

शहीद राजगुरु का प्रेरक जीवन
राजगुरु का जन्म पुणे के निकट खेड़ में हुआ था और उनका पूरा नाम शिवराम हरी राजगुरु था। राजगुरु को उनकी शूटिंग स्किल्स के लिए जाना जाता था और 'मैन ऑफ़ एचएसआरए' कहा जाता था। वे चंद्रशेखर के चहेते थें। उनके अचूक निशाने के चलते ही उनको सांडर्स की हत्या के लिए भेजा गया था।
भगत सिंह और पार्टी के अन्य लोग उन्हें गनमैन के नाम से भी पुकारते थे। वे शिवाजी के छापामार युद्ध के तरीकों और बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित थें।

शहीद सुखदेव का जीवन
सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को पंजाब में हुआ था। वे भगतसिंह के गाँव के पास ही लायलपुर में पले-बढ़े जिस करण दोनों में गहरी दोस्ती रही और दोनों लाहौर नेशनल कॉलेज के छात्र रहें।
वे बचपन से ही जिद्दी लेकिन दृढ़ स्वभाव वाले थे। सांडर्स हत्याकांड में उन्होंने भगत सिंह और राजगुरु का साथ दिया था। फांसी कि सज़ा सुनने पर उन्होंने डरने की बजाए ख़ुशी मनाई थी।
उन्होंने एक पत्र में कहा था कि यह फांसी बड़े पैमाने पर लोगों को अपने देश के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करेगी।
बेहद कम उम्र में तीनों सेनानियों ने हँसते हँसते फाँसी के फंदे को गले लगाया था। उनका यह कदम ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नीचा दिखाने के उद्देश्य से था। तीनों की हंसी को देखकर जेल अधिकारी भी अचंभित थें। इनके क्रांतिकारी विचार और कार्य भले ही कई लोगों को पसंद न हो, परन्तु कम उम्र में इनके जीवन का त्याग करना हम सभी को इन अमर शहीदों का ऋणी बनाता है।
भगत सिंह की ये पंक्तियाँ उनकी शहादत को हमारे दिलों में याद रखने में कामयाब होती हैं -
लिख रहा हूं मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आएगा
मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा
मैं रहूं या न रहूं पर, ये वादा है मेरा तुझसे
मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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