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सोशल मीडिया पर MMS लीक का बढ़ा खतरा: जानें इन्फ्लुएंसर्स क्यों बन रहे हैं साइबर अपराधियों का पहला निशाना?
MMS Video Leak Threat: बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर 19 मिनट 34 सेकंड के वायरल MMS ने ऐसा हड़कंप मचाया हुआ है कि हर कोई उसी के बारे में बात कर रहा है। बता दें कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ ऑनलाइन फेम और फॉलोअर्स की दुनिया जितनी ग्लैमरस दिखती है, उतनी ही खतरनाक भी साबित हो रही है। इस साल तो कई MMS वीडियो लीक होने के मामले सामने आए और हाल ही में स्वीट जन्नत के फेक MMS ने तो सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर की नींद उड़ा दी है। क्योंकि सबसे ज़्यादा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर को ही निशाना बनाया जा रहा है।
फॉलोअर्स की संख्या, ब्रांड डील्स और पॉपुलैरिटी बढ़ने के साथ-साथ साइबर क्राइमर्स, हैकर्स और ब्लैकमेलर्स की नजर भी उन पर टिकने लगी है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि ऐसी स्थिति न आए इसके लिए क्या करें और कभी ऐसी समस्या हो जाए तो उस समय क्या करना चाहिए। आज के आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर क्यों और कैसे सबसे ज्यादा सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर को निशाना बनाया जा रहा है।

क्यों इन्फ्लुएंसर्स और क्रिएटर बन रहे निशाना
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की लोकप्रियता जितनी तेजी से बढ़ती है, उतना ही साइबर अपराधियों का खतरा भी बढ़ जाता है। फॉलोअर्स, ब्रांड डील्स और फेम की वजह से इन्फ्लुएंसर्स डिजिटल दुनिया में चर्चा का केंद्र बन जाते हैं और यही उन्हें साइबर अटैकर्स, डेटा चोरों और ब्लैकमेलर्स के लिए आसान निशाना बना देता है। साइबर एक्सपर्ट्स के अनुसार, इन्फ्लुएंसर्स अक्सर कंटेंट बनाते समय ऑनलाइन टूल्स, एडिटिंग ऐप्स या अनजान फाइल/लिंक्स का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें ट्रोजन, स्पाइवेयर या मालवेयर छिपा हो सकता है।
एक बार फोन या लैपटॉप हैक हो जाने पर कैमरा एक्सेस, गैलरी, क्लाउड स्टोरेज और यहां तक कि सोशल मीडिया अकाउंट तक अपराधियों की पहुंच हो जाती है, जिसके बाद फर्ज़ी MMS, मॉर्फ्ड वीडियो और प्राइवेट डेटा लीक कर ब्लैकमेल किया जाता है।
असली और नकली MMS की पहचान कैसे करें?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई मामलों में वायरल हुए MMS असली न होकर AI, डीपफेक और मॉर्फिंग टेक्नोलॉजी की मदद से बनाए गए होते हैं। यानी व्यक्ति का चेहरा किसी और वीडियो पर लगाकर फर्जी MMS तैयार किया जाता है और फिर बदनामी या पैसे वसूली का दबाव डाला जाता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर असली और नकली एमएमएस की पहचान कैसे करें। बता दें कि नकली MMS में अक्सर चेहरे की मूवमेंट शरीर के साथ सिंक नहीं करती, एक्सप्रेशन असामान्य होते हैं और आंखों की ब्लिंकिंग नेचुरल पैटर्न में नहीं होती। होंठों की मूवमेंट आवाज से मेल नहीं खाती तो वीडियो मॉर्फ्ड होने की संभावना बढ़ जाती है।
चेहरे के किनारों पर अजीब ब्लर, रोशनी-छाया का अंतर, पिक्सेल टूटना या त्वचा का ज्यादा स्मूद और प्लास्टिक जैसा दिखना डीपफेक का बड़ा संकेत है। आवाज भी आमतौर पर बैकग्राउंड से मैच नहीं करती, टोन रोबोटिक या कृत्रिम लगती है। इसके अलावा ज्यादातर फेक MMS ,फेक अकाउंट्स, अज्ञात चैनलों या पोर्न प्लेटफॉर्म्स से सामने आते हैं, जबकि असली वीडियो का स्रोत आमतौर पर सीधे फोन या मूल डिवाइस होता है।

इसलिए किसी भी वायरल MMS पर तुरंत यकीन करने से पहले चेहरे, आवाज, लाइटिंग और वीडियो के स्रोत की जांच बेहद जरूरी है, क्योंकि ऐसे 70% से अधिक MMS फेक होते हैं और बिना पुष्टि के उन्हें देखना, डाउनलोड करना या शेयर करना कानूनन अपराध है।
इन्फ्लुएंसर्स खुद को MMS / हैकिंग से कैसे बचाएं?
मोबाइल और लैपटॉप में फ़िंगरप्रिंट + फेस लॉक + पिन तीनों सेट करें
अनजान लिंक, फाइल, वेबसाइट या एडिटिंग ऐप डाउनलोड न करें
ऑटो क्लाउड बैकअप बंद रखें
कैमरा एक्सेस सिर्फ भरोसेमंद ऐप्स को दें
हर 30 दिन में पासवर्ड बदलें
निजी डेटा गैलरी या फोन में रखने के बजाय एन्क्रिप्टेड वॉल्ट में रखें
VPN और एंटीवायरस का उपयोग करें
किसी भी अपरिचित व्यक्ति को फोन / लैपटॉप न दें
इन्फ्लुएंसर्स क्यों बन रहे हैं सबसे बड़े टारगेट?
पॉपुलैरिटी का फायदा उठाकर वायरल कंटेंट आसानी से फैलाया जा सकता है
ब्रांड डील्स और एडवर्टाइजमेंट के कारण आर्थिक ब्लैकमेलिंग की संभावना ज़्यादा
पब्लिक फिगर होने के चलते निजी ज़िंदगी में दखल देने की प्रवृत्ति बढ़ रही
कई इन्फ्लुएंसर्स के फोन में लगातार शूट होने वाले प्राइवेट फुटेज मौजूद होते हैं
सोशल मीडिया अकाउंट्स कई थर्ड-पार्टी टूल्स/ऐप्स से कनेक्ट रहते हैं



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