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भारत की एक ऐसी जगह जहां पांव रखना भी है मना, गलती से एंट्री करने पर मिलती है सजा-ए-मौत
अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का एक हिस्सा, उत्तरी सेंटिनल द्वीप, एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह बना है अमेरिका का 24 वर्षीय नागरिक मिखाइलो विक्टरोविच पोल्याकोव, जिसने प्रतिबंधित आदिवासी क्षेत्र में अवैध रूप से घुसने का प्रयास किया। मिली जानकारी के मुताबिक, पोल्याकोव 26 मार्च को पोर्ट ब्लेयर पहुंचा और वहां से गुपचुप तरीके से उत्तरी सेंटिनल द्वीप की ओर रवाना हो गया। 31 मार्च को उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। गृह विभाग को इस गिरफ्तारी की जानकारी दे दी गई है।

उत्तरी सेंटिनल द्वीप में क्यों जाना है मना?
उत्तरी सेंटिनल द्वीप बंगाल की खाड़ी में स्थित है और यह सेंटिनली जनजाति का निवास स्थान है। भारत सरकार ने इस द्वीप को 'विशेष रूप से संरक्षित आदिवासी क्षेत्र' घोषित कर रखा है। यहां बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश सख्त रूप से वर्जित है, क्योंकि यहां निवास करने वाले सेंटिनली लोग दुनिया की सबसे अलग-थलग और संवेदनशील जनजातियों में से एक हैं। इनका जीवन पूरी तरह से आदिम शैली पर आधारित है और ये बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं चाहते।
सरकार ने उनकी सुरक्षा और संस्कृति की रक्षा के लिए 'Look but don't touch' यानी 'देखें, लेकिन हस्तक्षेप न करें' की नीति अपना रखी है। इसका उद्देश्य है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति इस जनजाति के जीवन में दखल न दे, क्योंकि उनके पास आधुनिक बीमारियों के खिलाफ कोई प्रतिरोधक क्षमता नहीं है।
कौन हैं सेंटिनली जनजाति के लोग?
सेंटिनली लोगों को दुनिया की अंतिम प्री-नियोलिथिक जनजातियों में गिना जाता है। यानी वे आज भी हजारों साल पुरानी नवपाषाण काल की जीवनशैली जीते हैं। उनका व्यवहार बाहरी लोगों के प्रति पूरी तरह शत्रुतापूर्ण है। इतिहास गवाह है कि इस द्वीप पर आने या उतरने की कोशिश करने वालों को जान से हाथ धोना पड़ा है। नवंबर 2018 में एक अमेरिकी मिशनरी जॉन एलन चाऊ की हत्या कर दी गई थी, जब उसने सेंटिनली लोगों से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। कहा जाता है कि वह उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहता था।
पूर्व में भी हुई हैं हिंसक घटनाएं
यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी बाहरी व्यक्ति की जान को खतरा हुआ हो। वर्ष 2006 में दो भारतीय मछुआरे जब गलती से अपनी नाव से उत्तरी सेंटिनल द्वीप के पास पहुंच गए थे, तब सेंटिनली लोगों ने उन्हें भी मार डाला था। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि यह जनजाति बाहरी संपर्क को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करती।
सेंटिनलीज अपने छोटे से द्वीप पर तीर-कमान और भालों की मदद से शिकार कर जीवन यापन करते हैं। वे किसी भी आधुनिक संसाधन या तकनीक से दूर रहकर प्रकृति के साथ पूर्ण तालमेल में जीते हैं। उनकी इस अद्भुत जीवनशैली को बचाने के लिए भारतीय सरकार लगातार सख्त कदम उठाती रही है।



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