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अब बच्चों में भी पित्त की पथरी के लक्षण

पित्ताषय की थैली एक छोटा सहायक पाचन अंग होता है जो पित्त को संग्रहित करता है और जिसे शरीर वसा पाचन के लिए प्रयोग करता है। जरुरत पड़नें पर पित्त आंत में जारी कर दी जाती है। पित्त में पानी, वसा, लवण, प्रोटीन, बिलीरुबिन और कोलेस्ट्रॉल होता है। पित्त तब बनता है जब पित्त रस कुछ कारणों सें पित्ताषय की थैली को नहीं छोड़ता और कोलेस्ट्राॅल और बिलीरुबिन सख्त हो जाता है।
बच्चों में काले, भूरें वर्णक, कोलेस्ट्रॉल, कैल्शियम कार्बोनेट या प्रोटीन-डामन्नट पथरी बन सकती है। काली वर्णक पथरी सबसे अघिक 48 प्रतिशत पाई गई है, जबकि कोलेस्ट्रॉल पथरी इस आयु वर्ग में 21 प्रतिशत पाई जाती है। बच्चों में कई कारक पित्त पथरी गठन के खतरें को बढ़ाते है- जैसे मोटापा, सिस्टक फाइब्रोसिस, सिकल सेल एनीमिया, आदि। इसके अलावा जो बच्चें भोजन नली पर लम्बें समय के लिए रखें जातें है। उनमें पित्त पथरी बढ़ने का खतरा ज्यादा होता है।
समय से पूर्व पैदा हुए नवजात जिनका वज़न कम होता है और जिन्हें लम्बें समय तक अस्पताल में भर्ती करना पडता है, उनमें भी पित्त पथरी हो सकती है। इसके अलावा बच्चों में पित्त पथरी के साथ थैलेसीमिया मेजर 2.3 प्रतिशत से लेकर 23 प्रतिषत तक बदलता है और उम्र के साथ बढ़ता है। छोटे बच्चों में इसका कारण लाल रक्त कोशिका के कारण भी होती है जो समय से पहलें इन कोकशिकाओं को तोड़ देता है (रक्तलायी अरक्तता)। यह हीमोग्लोबिन बिलीरुबिन में परिवर्तित हो जाता है जो की कुछ परिस्थितियो में इक्ट्ठा हो कर पथरी बन जाती है।
आमतैर पर इस आयुवर्ग में पथरी स्वंय घुल जाती है क्योंकि यह कुछ और नही बल्कि पित्त कीचड़ है, जो अकसर पित्त पथरी के रूप में गलत समझी जाती है। कुछ ही समय में यह कीचड़ स्वंय ही पिघल जाती है।
आर जी स्टोन हास्पिटल के मुख्य लेप्रोस्कोपी सर्जन अशोक मित्तल के अनुसार पित्त की पथरी की बिमारी एक आम पाचन रोगों में से एक है। मोटे बच्चों में पित्त पथरी का खतरा ज़्यादा होता है क्योंकि एैसे मामलों में जिगर कोलेस्ट्रौल का ज़्यादा उत्पादन करता है, जो की पित्त को सौप दिया जाता है जिससे वह पूरी तरह से भर जाता है और पथरी बनती है। पित्त पथरी आहार से संबंधित है, विषेष रूप से वसा के सेवन से, इसलिए उचित है की एक स्वस्थ आहार ले, खासकर फाइबर युक्त भोजन। व्यक्ति को अंडे की ज़र्दी, मक्खन, चीज़, प्रोसेस्ड मांस, चिकन, मसाले और फास्ट फूड का अत्याधिक सेवन नही करना चाहिए। इसके अलावा माता-पिता को बच्चों को नियमित रूप से व्यायाम के लिए और खूब पानी के लिए कहना चाहिए।
डा अअशोक मित्तल ने आगे बताया कि पित्त की पथरी के प्रभावी उपचार में पथरी को हटाना (कोलेसिस्टोलीथोटोमी) या पित्तषय को हटाना (कोलेसिस्टेक्टोमी) शामिल है। लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी, बच्चों में रोगसूचक पित्ताषय की थैली के रोगो के प्रबंधन का एक पंसदीदा तरीका बन गया है। लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी कम समय के लिए अस्पताल में रहने, तेज़ी से आहार बहाली और षल्यचिकित्सा के बाद बेचैनी और न्यूनतम रूग्णता के साथ जुड़ा हुआ है।
आगे बताते हुए डा अशोक मित्तल ने कहा, "चूंकि पित्तषय की थैली का एकमात्र कार्य पित्त को जमा करना है, यह पाचन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नही है। पित्ताषय की थैली, पित्त पथरी को समाप्त कर सकती है, लेकिन इस इलाज में कुछ महीने से कुछ साल भी लग सकते है और छोटे बच्चों में पित्त पथरी अपने आप ही घुल जाती है।"
16 वर्षीय अनुषक्ति ने बताया "मैं पहले पेट दर्द से पीडि़त थी और मैनें कई डाक्टरों को दिखाया, पर कोई फायदा नही हुआ। वह तेज़ी से बढ़ता दर्द असहनीय था। पर जैसे ही मैं आर जी स्टोन आई, निदान में पित्त पथरी पाई गई और तुरंत इलाज षुरू कर दिया गया। आखिरकार मुझे अपनी तकलीफ से छुटकारा मिला और इसके लिए मैं आर जी स्टोन को धन्यवाद देना चाहती हुँ।"
13 वर्षीय ब्रिजेष (पित्त पथरी का मरीज़) के पिता शरेशवाल ने बताया, "नई तकनीक और सुविधाओं के साथ आर जी स्टोन के डॉक्टरों और सहायक कर्मचारियों से मैं काफी प्रभावित हुँ। उनमें अत्यंत धैर्य है। जिस तरह से वह अपने रोगियों का इलाज करते है वह वास्तव में मार्गस्पर्षी है। हर मरीज के लिए उनकी करूणा और सरोकार से मे अभिभूत हुँ।"



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