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Sapinda Vivah: क्या है 'सपिंड विवाह' जिस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने लगाई रोक? क्यों हैं हिंदुओं को करने की मनाही
Sapinda Vivah Kya Hai: दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंदू धर्म में सपिंड विवाह को लेकर फैसला सुनाया है। अदालत ने हिंदू मैरिज एक्ट के दायरे में आने वाले सपिंड विवाह के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट का कहना है, 'यदि विवाह के लिए साथी के चुनने को बिना नियमों के छोड़ दिया जाए, तो अनाचारपूर्ण रिश्तों को वैधता मिल सकती है।
अदालत में हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 5 (v) को चुनौती देने वाली एक याचिका दायर की गई थी। हिंदू एक्ट की इस धारा में कहा गया है कि किन्हीं दो हिंदू व्यक्तियों के बीच विवाह को वैध माना जाएगा, यदि वे एक-दूसरे के सपिंड नहीं हैं।

सपिंड शब्द पिंड शब्द से आया है। पिंड मतलब वो गोल आकार के चावल जो श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाते हैं। आइए जानते हैं कि हिंदू धर्म में सपिंड विवाह किसे कहते हैं और क्यो हैं यह अमान्य?
क्या है सपिंड विवाह?
सपिंड विवाह उन दो लोगों के बीच होता है जो आपस में खून के बहुत करीबी रिश्तेदार होते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट में, ऐसे रिश्तों को सपिंड कहा जाता है। इनको तय करने के लिए एक्ट की धारा 3 में नियम दिए गए हैं। धारा 3(f)(ii) के मुताबिक, 'अगर दो लोगों में से एक दूसरे का सीधा पूर्वज हो और वो रिश्ता सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, या फिर दोनों का कोई एक ऐसा पूर्वज हो जो दोनों के लिए सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, तो दो लोगों के ऐसे विवाह को सपिंड विवाह कहा जाएगा।
हिंदू मैरिज एक्ट के हिसाब से, एक लड़का या लड़की अपनी मां की तरफ से तीन पीढ़ियों तक किसी से शादी नहीं कर सकता/सकती। मतलब, अपने भाई-बहन, मां-बाप, दादा-दादी और इन रिश्तेदारों के रिश्तेदार जो मां की तरफ से तीन पीढ़ियों के अंदर आते हैं, उनसे शादी करना पाप और कानून दोनों के खिलाफ है। पैतृक पक्ष की तरफ से ये पाबंदी पांच पीढ़ियों तक लागू होती है। यानी आप अपने दादा-परदादा आदि जैसे दूर के पूर्वजों के रिश्तेदारों से भी शादी नहीं कर सकते/सकतीं। यह सब इसलिए है कि बहुत करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी से शारीरिक और मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, कुछ खास समुदायों में अपने मामा-मौसी या चाचा-चाची से शादी करने का रिवाज होता है, ऐसे में एक्ट के तहत उस शादी को मान्यता दी जा सकती है।
अमान्य घोषित होगी ऐसी शादी
अगर आप ऐसे किसी रिश्तेदार से शादी करते हैं जिनके साथ आपके पूर्वज पांच पीढ़ी पहले तक एक ही थे, तो ये शादी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मानी नहीं जाएगी। ऐसी शादी को "सपिंड विवाह" कहते हैं और अगर ये पाई जाती है और इस तरह की शादी का कोई रिवाज नहीं है, तो उसे कानूनी तौर पर अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि ये शादी शुरू से ही गलत थी और इसे कभी नहीं हुआ माना जाएगा। सपिंड शादी करने पर लोगों को सजा दी जा सकती है। हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 18 के तहत दी जाने वाली सजा में जुर्माने और जेल का प्रावधान है। इसके अनुसार, धारा 5 (v) का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 1 महीने तक की जेल या 1000 रुपये का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है।
किन्हें हैं सपिंड विवाह करने की छूट?
हिंदू मैरिज एक्ट ऐसे लोगों को सपिंड विवाह करने की छूट देता है जिनमें दोनों पक्षों के समुदायों में सपिंड शादी का रिवाज है। इसमें शर्त है कि उस रिवाज को बहुत लंबे समय से और लगातार और बिना किसी बदलाव के मान्यता मिलनी चाहिए। साथ ही, वो रिवाज इतना प्रचलित होना चाहिए कि उस क्षेत्र, कबीले, समूह या परिवार के हिंदू मानने वाले उसका पालन कानून की तरह करते हों।



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