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Best Krishna Shlok on Janmashtami 2024: श्रीमद भगवद गीता, महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, और जीवन के गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन अपने संबंधियों के खिलाफ लड़ने में संकोच करते हैं, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता के उपदेश दिए।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया कि हर व्यक्ति का धर्म (कर्तव्य) सबसे महत्वपूर्ण है, और उसे निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्होंने कर्मयोग का महत्व समझाते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने कार्यों के फल की चिंता किए बिना, पूरी निष्ठा से कर्म करना चाहिए।
इसके अलावा, श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता का उपदेश दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा न कभी जन्म लेती है, न ही मरती है।
उन्होंने भक्ति योग, ज्ञान योग, और ध्यान योग के मार्गों का उल्लेख किया, और कहा कि भगवान की शरण में जाकर, मनुष्य सभी बंधनों से मुक्त हो सकता है। गीता का मुख्य संदेश है कि सही मार्ग पर चलते हुए धर्म का पालन करना ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
Krishna Quotes from Bhagwad Gita in Sanskrit on Janmashtami 2024

1.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो। कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।

2.
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म की ग्लानि-हानि यानी उसका क्षय होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं श्रीकृष्ण धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयं की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।
3.
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थ: क्रोध से मनुष्य की मति-बुदि्ध मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है, कुंद हो जाती है। इससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।
Happy Krishna Janmashtami 2024 Quotes and Status
4.
नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥
अर्थ: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। यहां श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।

5.
श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थ: श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधन पारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति को प्राप्त होते हैं।

6.
जीवन न तो भविष्य में है और ना ही अतीत में, जीवन तो बस इस पल में है।
Bhagwan Shri Krishna Ke Updesh
7.
न यह शरीर तुम्हारा है और न तुम शरीर के हो.
यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा.
पर आत्मा स्थिर है- फिर तुम क्या हो।
8.
जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, तुम भूत का पश्चाताप न करो।

9.
परिवर्तन संसार का नियम है.
जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है.
एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो,
दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो.
मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना पराया, मन से मिटा दो,
फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
10.
क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है।
जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है।
जब तक नष्ट होता है, तब तक व्यक्ति का पतन हो जाता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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