Latest Updates
-
संडे स्पेशल डिनर के लिए परफेक्ट है पनीर कॉर्न पुलाव, स्वाद ऐसा कि सब मांगेंगे दोबारा -
सूरज की तपिश से काला पड़ गया है चेहरा? इन 3 देसी नुस्खों से हटाएं जिद्दी सन टैन -
क्या बारिश से हुए नुकसान पर सरकार और इंश्योरेंस कंपनी से मिलता है मुआवजा? हां, तो जानें कैसे करें क्लेम? -
छोटी हाइट वाली लड़कियों पर सबसे ज्यादा जंचते हैं ये आउटफिट, दिखती हैं सुपर स्टाइलिश और लंबी -
बरसात में इन 5 लोगों को गलती से भी नहीं खाना चाहिए दही, वरना बिगड़ सकती है सेहत -
Ravi Pradosh Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा है रवि प्रदोष व्रत, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और शिव आरती -
World Paper Bag Day 2026: कब और क्यों हुई पेपर बैग दिवस की शुरुआत? जानें इसका दिलचस्प इतिहास -
गलती से भी पास-पास न रखें मनी प्लांट और तुलसी का पौधा, वरना कंगाली के साथ आ जाएंगी ये 3 बड़ी मुसीबतें -
इस एक श्राप की वजह से अविवाहित कपल्स नहीं कर सकते जगन्नाथ मंदिर में दर्शन, आप भी जान लें रहस्य -
Varalakshmi Vrat के दिन लगेगा साल का आखिरी चंद्र ग्रहण, जानें क्या करें, क्या न करें और सूतक के नियम
Surya Grahan 2026: ग्रहण के समय खाने की चीजों में तुलसी क्यों डाली जाती है? जानें धार्मिक और वैज्ञानिक सच
Why Tulsi is put in food during eclipse: 17 फरवरी 2026 को यानी आज मंगलवार को लग रहा है साल का पहला सूर्य ग्रहण जिसको लेकर चर्चाएं तेज हैं। भारत में ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक अनुभव भी है। वहीं इस दिन को लेकर कुछ रोचक मान्यताएं भी हैं। जैसे ही ग्रहण की घड़ी करीब आते ही, हम देखते हैं कि घरों में रखे दूध, दही और पानी के बर्तनों में तुलसी के पत्ते (Basil Leaves) डाल दिए जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों सालों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे का असली तर्क क्या है?
क्या यह केवल एक धार्मिक विश्वास है, या इसके पीछे कोई ठोस विज्ञान भी छिपा है? आइए आज इस बारे में विस्तार से जान लेते हैं और देखते हैं कि क्या कहता है विज्ञान और शास्त्रों का क्या मानना है...

धार्मिक और शास्त्रीय दृष्टिकोण
भारतीय शास्त्रों में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि 'विष्णुप्रिया' और अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के समय नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे भोजन और जल 'अशुद्ध' हो जाते हैं। तुलसी अपनी सात्विक ऊर्जा के कारण भोजन को इस अशुद्धि से बचाती है। वहीं शास्त्रों का मत है कि जिस भोजन में तुलसी का पत्ता डाल दिया जाता है, उस पर सूतक काल के नियमों का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता और वह ग्रहण के बाद भी उपयोग के योग्य रहता है।
वैज्ञानिक आधार क्या कहता है
विज्ञान की दृष्टि से देखें तो तुलसी के पत्ते का उपयोग महज एक मान्यता नहीं बल्कि एक उत्कृष्ट सुरक्षा तकनीक (Natural Shield) है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रहण के दौरान वायुमंडल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (विद्युत-चुंबकीय विकिरण) का स्तर बदलता है। तुलसी में पारा (Mercury) और विशिष्ट तेल होते हैं जो इन हानिकारक तरंगों को अवशोषित करने या उन्हें बेअसर करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा सूर्य की रोशनी कम होने से वातावरण में बैक्टीरिया पनपने की संभावना बढ़ जाती है। तुलसी एक शक्तिशाली एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल एजेंट है, जो तरल पदार्थों में सूक्ष्मजीवों को बढ़ने से रोकती है।
आयुर्वेद का क्या है तर्क
आपने वैज्ञानिक और धार्मिक कारण तो जान लिया है अब आयुर्वेद क्या कहता है वो भी जान लें। आयुर्वेद के अनुसार, ग्रहण के समय सूर्य के मंद होने से हमारी पाचन शक्ति भी कमजोर होती है। तुलसी के पत्ते अपनी औषधीय प्रकृति से भोजन के गुणों को संरक्षित रखते हैं, जिससे वह पाचन के लिए हल्का और सुरक्षित बना रहता है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में बताए गए रत्नों के लाभ पारंपरिक मान्यताओं और ज्योतिषीय अनुभवों पर आधारित हैं। हर इंसान पर इसका असर अलग हो सकता है। किसी भी रत्न को पहनने से पहले किसी योग्य ज्योतिषी या रत्न विशेषज्ञ से जरूर सलाह लें। यह लेख सिर्फ जानकारी देने के उद्देश्य से है और इसे प्रोफेशनल सलाह का विकल्प न समझें।



Click it and Unblock the Notifications