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Harish Rana Is Alive Or Not? जानें भारत में इच्छामृत्यु का सबसे पहला मामला कौन सा था?
Harish Rana Is Alive Or Not-Latest Update: 32 साल का एक लड़का जो पिछले 13 सालों से एक जिंदा लाश की तरह जी रहा है। जी हां हम बात कर रहे हैं हरीश राणा की जिनकी चर्चा सोशल मीडिया पर चरम पर है। हर कोई जानना चाहता है कि अभी हरीश राणा जिंदा हैं या नहीं? गुगल सर्च पर ऐसे प्रश्न तेजी से ट्रेंड हो रहे हैं। वहीं 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया है।
जहां एक ओर एम्स (AIIMS) में हरीश को गरिमापूर्ण मृत्यु देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर दुनिया को अरुणा शानबाग की वो दर्दनाक कहानी याद आ गई है, जिसने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी दरवाजे खोले थे। आइए जानते हैं, आखिर क्या है हरीश राणा की वर्तमान स्थिति और कौन थी वो अरुणा शानबाग, जिनका जिक्र किए बिना भारत में मौत के अधिकार की बात अधूरी है।

हरीश राणा: जीवित हैं या नहीं?
हर कोई हरीश राणा के बारे में जानना चाहता है कि वो जिंदा है या नहीं? गूगल पर ऐसे प्रश्न तेजी से सर्च किए जा रहे हैं। बता दें कि हरीश राणा अभी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं और फिलहार जीवित हैं और धीरे-धीरे अपने अंतिम सफर की ओर बढ़ रहे हैं। जानकारी के लिए बता दें कि साल 2013 में चंडीगढ़ में एक पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए थे। पिछले 13 साल से उनके वृद्ध माता-पिता ने उनकी सेवा की, लेकिन जब उम्मीदें खत्म हो गईं, तो उन्होंने कोर्ट से अपने बेटे के लिए 'गरिमापूर्ण मौत' की गुहार लगाई।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता की अर्जी स्वीकार करते हुए 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी। अभी एम्स दिल्ली के डॉक्टरों की टीम ने हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम (फीडिंग ट्यूब और दवाइयां) को धीरे-धीरे हटाना शुरू कर दिया है। यह एक धीमी प्रक्रिया है ताकि मरीज को बिना किसी दर्द के शांतिपूर्ण अंत मिल सके।
कौन थी अरुणा शानबाग?
जब भी इच्छामृत्यु की बात होती है, अरुणा शानबाग का नाम सबसे पहले आता है। वे भारत में इस कानून की जननी मानी जाती हैं। अरुणा मुंबई के केईएम (KEM) अस्पताल में एक नर्स थीं। 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड बॉय ने उनके साथ बर्बरता की और जंजीर से उनका गला घोंटा, जिससे उनके दिमाग को ऑक्सीजन मिलनी बंद हो गई। अरुणा अगले 42 साल तक अस्पताल के एक कमरे में कोमा जैसी स्थिति में रहीं। वे न बोल सकती थीं, न चल सकती थीं।
भारत में सबसे पहला इच्छा मृत्यु का केस
अरुणा शानबाग की हालत को देखते हुए उनकी मित्र पिंकी विरानी ने उनके लिए इच्छामृत्यु की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, 2011 में कोर्ट ने अरुणा को मृत्यु की अनुमति नहीं दी, लेकिन उनके केस की वजह से ही 'पैसिव यूथेनेशिया' को भारत में पहली बार मान्यता मिली। साल 2015 में अरुणा ने स्वाभाविक रूप से अंतिम सांस ली। वीकिपिडिया के अनुसार, अरुणा की मृत्यु निमोनिया की वजह से हुई थी।
क्या है 'एक्टिव यूथेनेशिया' और 'पैसिव यूथेनेशिया' क्या है?
'एक्टिव यूथेनेशिया' के अंतर्गत व्यक्ति को जहर का इंजेक्शन देकर मारा जाता है जो भारत में गैरकानूनी है। वहीं पैसिव यूथेनेशिया में मरीज को जीवित रखने वाले उपकरणों को धीरे-धीरे हटाया जाता है और उसे नेचुरल मौत दी जाती है जो भारत में कानूनी है। हरीश राणा को भी पैसिव यूथेनेशिया के तहत इच्छा मृत्यु दी गई है और वो दिल्ली के एम्स में धीरे-धीरे अपने अंतिम सफर की ओर बढ़ रहे हैं।
एक तरफ हरीश के माता-पिता के लिए ये एक दिल तोड़ देने वाली बात है क्योंकि कोई ऐसे मां-बाप नहीं होंगे जो अपने बेटे की मृत्यु पर खुश हों। वहीं दूसरी तरफ बेटे के दर्द को देखते हुए उनके लिए राहत की भी बात है क्योंकि एक इंटरव्यू में खुद हरीश के माता-पिता ने कहा था कि अब उनका बूढ़ा शरीर बेटे की देखभाल नहीं कर सकता।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।
42 साल तक कोमा जैसी स्थिति में रहने के बाद, अरुणा शानबाग की मृत्यु 18 मई 2015 को निमोनिया के कारण प्राकृतिक रूप से हुई थी।
भारत में इच्छामृत्यु का सबसे पहला और चर्चित मामला अरुणा शानबाग (2011) का था। हालांकि उन्हें मृत्यु की अनुमति नहीं मिली थी, लेकिन उनके केस ने ही भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' के लिए कानूनी आधार तैयार किया था।



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