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हरीश राणा को कैसे दी जाएगी 'इच्छामृत्यु'? वेंटिलेटर हटने से लेकर अंतिम सांस तक, मरीज के साथ क्या-क्या होता है?
Harish Rana euthanasia case: 13 साल का लंबा इंतजार, अनगिनत रातों की सिसकियां और एक बेटे को तिल-तिल दम तोड़ते देखने की बेबसी गाजियाबाद के राणा दंपत्ति के लिए यह सफर किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। लेकिन अब, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, 32 वर्षीय हरीश राणा 'इच्छामृत्यु' (Passive Euthanasia) के जरिए शांति की ओर बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए उस 22 सेकंड के वीडियो ने, जिसमें एक स्पिरिचुअल लीडर हरीश को "सबको माफ करते हुए जाओ" कह रही हैं, पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मगर सवाल यह उठता है कि आखिर यह प्रक्रिया पूरी कैसे होती है?
क्या लाइफ सपोर्ट हटने के बाद मरीज को तड़पना पड़ता है? चिकित्सा विज्ञान और कानून मिलकर कैसे एक इंसान की 'गरिमापूर्ण मृत्यु' सुनिश्चित करते हैं? आइए, वेंटिलेटर हटने से लेकर अंतिम सांस तक के उस मेडिकल प्रोटोकॉल को विस्तार से समझते हैं।

पैसिव यूथिनिसिया क्या होता है?
भारत में 'एक्टिव यूथिनिसिया' (जहर का इंजेक्शन देना) गैरकानूनी है, इसलिए हरीश राणा के मामले में 'पैसिव यूथिनिसिया' अपनाया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है उन तमाम कृत्रिम उपचारों को चरणबद्ध तरीके से हटा लेना जो मरीज को केवल मशीनों के जरिए जीवित रखे हुए हैं। इसमें वेंटिलेटर बंद करना, दवाइयां रोकना और फीडिंग ट्यूब (भोजन की नली) को धीरे-धीरे कम करना शामिल है।
दर्दरहित विदाई (Palliative Care)
इच्छामृत्यु का अर्थ कष्ट देना कतई नहीं है। मेडिकल बोर्ड के प्रोटोकॉल के तहत हरीश को 'पैलिएटिव केयर यूनिट' में रखा गया है। यहां मुख्य उद्देश्य मरीज को ठीक करना नहीं, बल्कि उसके दर्द को खत्म करना है। मरीज को ऐसी दवाएं दी जाती हैं जिससे वह गहरी नींद या बेहोशी की स्थिति में रहे। यदि वेंटिलेटर हटने के बाद सांस लेने में हल्की भी तकलीफ (Gasps) महसूस होती है, तो तुरंत पेन रिलीफ दवाएं दी जाती हैं ताकि मरीज शांति से विदा हो सके।
इच्छामृत्यु की चरणबद्ध प्रक्रिया
आर्टिफिशियल ट्रीटमेंट की समाप्ति
मरीज को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे सभी कृत्रिम उपचारों (Artificial Treatments) को चरणबद्ध तरीके से धीरे-धीरे बंद किया जाता है।
लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाना
सबसे पहले वेंटिलेटर जैसे जीवन रक्षक उपकरणों को हटाया जाता है। इसके बाद जीवन रक्षक दवाइयों की खुराक कम की जाती है और अंत में फीडिंग ट्यूब (भोजन की नली) के जरिए आहार देना बंद किया जाता है।
मेडिकल बोर्ड प्रोटोकॉल का पालन
पूरी प्रक्रिया दो विशेष मेडिकल बोर्ड द्वारा निर्धारित सख्त गाइडलाइंस और प्रोटोकॉल के आधार पर ही संचालित की जाती है।
उच्च स्तरीय व्यक्तिगत देखभाल
विदाई की इस प्रक्रिया के दौरान भी मरीज की गरिमा का पूरा ख्याल रखा जाता है। इसमें कपड़े बदलने से लेकर शरीर की साफ-सफाई (Sponge bath) जैसी हर बुनियादी देखभाल निरंतर जारी रहती है।
पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्टिंग
मरीज को एक विशेष 'पैलिएटिव केयर यूनिट' (Palliative Care Unit) में रखा जाता है। यहाँ मुख्य उद्देश्य मरीज को ठीक करना नहीं, बल्कि उसकी अंतिम यात्रा को 'कष्टमुक्त' बनाना होता है।
दर्द निवारक उपचार (Pain Management)
मरीज को ऐसी दवाएं दी जाती हैं जो उनके शरीर के दर्द और बेचैनी को खत्म कर दें, ताकि वह बिना किसी तड़प के धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ सकें।
परिजनों की काउंसिलिंग
डॉक्टरों द्वारा परिवार को स्पष्ट रूप से सूचित किया जाता है कि अब दी जा रही दवाएं जीवन बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि केवल एक 'दर्दरहित विदाई' सुनिश्चित करने के लिए हैं।
कैसे पता चलता है कि मरीज को दर्द हो रहा है?
जो मरीज सालों से बोल नहीं पा रहे, उनके दर्द को भांपने के लिए डॉक्टर 'हीमोडायनेमिक्स' (शारीरिक संकेतों) पर नजर रखते हैं। यदि अचानक मरीज की धड़कन तेज हो जाए या ब्लड प्रेशर बढ़ जाए, तो यह संकेत है कि शरीर कष्ट में है। चेहरे की मांसपेशियों में खिंचाव या माथे पर शिकन से भी डॉक्टर दर्द का अंदाजा लगाते हैं और तुरंत दवा की खुराक एडजस्ट करते हैं।
कड़े नियमों के बीच 'मुक्ति' का मार्ग
हरीश को यह इजाजत इतनी आसानी से नहीं मिली। इसके लिए दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड्स ने उनकी स्थिति की गहन जांच की। जब दोनों बोर्ड इस नतीजे पर पहुंचे कि हरीश के ठीक होने की 0% संभावना है और उनका जीवन केवल कष्टकारी मशीनों पर टिका है, तभी कानून ने इस 'सम्मानजनक विदाई' पर मुहर लगाई।
अंतिम क्षणों की तैयारी
इस पूरी प्रक्रिया में वेंटिलेटर हटने के बाद कुछ घंटों से लेकर 2-3 दिन तक का समय लग सकता है। इस दौरान परिवार को स्पष्ट कर दिया जाता है कि अब जो भी दवा दी जा रही है, वह जीवन बचाने के लिए नहीं बल्कि 'दर्दरहित अंत' के लिए है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।
नहीं। मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत मरीज को 'पैलिएटिव केयर' में रखा जाता है, जहाँ उसे भारी मात्रा में दर्द निवारक (Painkillers) और बेहोशी की दवाएं (Sedatives) दी जाती हैं ताकि उसकी अंतिम यात्रा पूरी तरह दर्दरहित हो।
एक्टिव यूथेनेशिया में मरीज को जानलेवा इंजेक्शन या दवा देकर मृत्यु दी जाती है, जो भारत में गैरकानूनी है। पैसिव यूथेनेशिया में मरीज को जीवित रखने वाले 'लाइफ सपोर्ट' (वेंटिलेटर, दवाइयां) को हटा लिया जाता है ताकि मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके।



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