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बंगाली क्यों खाते हैं सरस्वती पूजा के अगले दिन बासी खाना, इसके पीछे है ये वैज्ञानिक कारण
बंगाली समाज में सरस्वती पूजा के अगले दिन शीतला षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन छह प्रकार की सब्जियों को एक साथ उबालकर खाने की परंपरा है। सरस्वती पूजा के दिन यह भोजन पकाया जाता है और अगले दिन ठंडा करके खाया जाता है, जिसे बासी भोजन भी कहा जा सकता है।
कई स्थानों पर नौ प्रकार की गोटा दाल और सब्जियों का मिश्रण (सीजानो) तथा ठंडा भात माता शीतला को अर्पित किया जाता है। इसके बाद पूरा परिवार इस भोजन को ग्रहण करता है। शीतला षष्ठी में सीजानो खाने और खिलाने की विशेष परंपरा होती है।

बासी खाना खाने की वैज्ञानिक परांपरा
बंगाली परिवारों में शीतला षष्ठी के दिन चूल्हा जलाने की परंपरा नहीं होती। इस दिन सिलबट्टे पर भी कुछ नहीं पीसा जाता। सुबह विधि-विधान से घरों में चूल्हे और सिलबट्टे की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि चूंकि यह शीतल षष्ठी होती है, इसलिए गर्म भोजन के बजाय एक दिन पहले पका ठंडा भोजन ग्रहण करना शुभ माना जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। उबला हुआ भोजन पौष्टिक होता है और इस मौसम में होने वाली चेचक, संक्रमण और इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों से बचाव करता है। डॉक्टर भी इसे स्वास्थ्यवर्धक और आरामदायक भोजन मानते हैं, जो शरीर को ठंडा रखता है।
इस दिन खाया जाता है गोटा सेढ़ा और सीजानो
चूंकि यह षष्ठी तिथि है, इस दिन छह प्रकार की मौसमी सब्जियों को एक साथ उबालकर खाने की परंपरा है, जिसे बंगाली भाषा में गोटा सेढ़ा कहा जाता है। परिवार का कोई व्रती सीजानो तैयार करता है। इस भोजन में आमतौर पर आलू, सेम, बैंगन, पालक, कुल्थी और कच्ची मूंग दाल को मिलाकर उबाला जाता है। क्षेत्र विशेष के अनुसार सीजानो मनाने के तरीके भिन्न होते हैं। कुछ लोग इसमें मछली भी शामिल करते हैं, जबकि कुछ इसे पूरी तरह शाकाहारी रखते हैं। यह पौष्टिक भोजन शरीर को ठंडा रखता है और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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