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नोएडा के चाइल्ड PGI में खुला देश का पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट, जानें किसे पड़ती है जरूरत?
UP deputy CM opens BMT unit for newborn ICU in Noida : नोएडा के सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने चार करोड़ रुपये की लागत से बनी आठ बेड की बोनमेरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट का उद्घाटन किया। प्रदेश की पहली बीएमटी यूनिट से मरीजों को अब दिल्ली जाने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे इलाज सुलभ और सुविधाजनक हो सकेगा।
उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने चाइल्ड पीजीआई अस्पताल में मीडिया से बातचीत में कहा कि यहां स्थापित इस आधुनिक सिस्टम का लाभ न केवल नोएडा बल्कि आसपास के जिलों के लोग भी उठा सकेंगे। उन्होंने इसे अत्याधुनिक और मरीजों के लिए उपयोगी बताया। नई सुविधा से क्षेत्र में चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ेगी और मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध हो सकेगा। आइए जानते हैं कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट क्या होता है और कब बच्चों को इसकी पड़ती है जरूरत?

बोन मेरो ट्रांसप्लांट क्या है?
बोन मेरो ट्रांसप्लांट की आवश्यकता तब होती है जब बोन मेरो डिफेक्टिव हो जाता है और काम करना बंद कर देता है। ट्रांसप्लांट के लिए रोगी और डोनर के बोन मेरो का मेल आवश्यक होता है, जिसमें 'एचएलए' का शत-प्रतिशत मिलना अनिवार्य है। 'एचएलए' के समान होने की संभावना सगे भाई-बहन में 25% और माता-पिता में केवल 1-3% होती है।
थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया जैसे रोगों में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। जरूरी जांच के बाद रोगी को अस्पताल की बोन मेरो यूनिट में भर्ती किया जाता है। पहले, सात से दस दिनों तक कीमो के माध्यम से रोगी का बोन मेरो नष्ट किया जाता है। इसके बाद, डोनर से प्राप्त 350 एमएल बोन मेरो को आईबी के माध्यम से बल्ड की तरह चढ़ा दिया जाता है। यह सर्जरी नहीं, बल्कि सामान्य प्रक्रिया है।
कब किया जाता है बोन मेरो ट्रांसप्लांट?
बोन मेरो ट्रांसप्लांट तब किया जाता है जब रोगी थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ल्यूकेमिया, या एप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो। कम उम्र में, विशेषकर 10-12 वर्ष तक, ट्रांसप्लांट की सफलता की संभावना 95% तक होती है। इसलिए, डॉक्टर 2-10 वर्ष की उम्र में ही थैलेसीमिया या सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित बच्चों को ट्रांसप्लांट कराने की सलाह देते हैं।
ल्यूकेमिया या एप्लास्टिक एनीमिया के मामलों में, बीमारी की पहचान होते ही डॉक्टर तुरंत बोन मेरो ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू करते हैं। यह समय पर किया गया उपचार रोगी के जीवन को बेहतर बनाने और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को पुनः स्थापित करने में सहायक होता है।
बोन मेरो ट्रांसप्लांट का खर्चा कितना आता है?
बोन मेरो ट्रांसप्लांट का खर्च रोगी की बीमारी पर निर्भर करता है। थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसे मामलों में इसका खर्च 10-12 लाख रुपये तक आता है। हालांकि, मुख्यमंत्री योजना, प्रधानमंत्री योजना, महात्मा फुले योजना, या शिल्पा कल्पतरु जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से यह खर्च काफी कम हो सकता है। इन योजनाओं का उद्देश्य आर्थिक बोझ कम करना और अधिक रोगियों को इलाज सुलभ बनाना है। ये प्रयास गंभीर बीमारियों से जूझ रहे परिवारों के लिए राहत प्रदान करते हैं।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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