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क्या है 178 साल पुराना 'फिश प्रसादम', इसे खाने से क्या सच में ठीक होता है अस्थमा? जानें एक्सपर्ट की राय
हैदराबाद का प्रसिद्ध "मछली प्रसादम" (Fish Prasadam) जिसे अस्थमा ठीक करने का पारंपारिक अचूक इलाज माना जाता है। हर साल की तरह बाथिनी गौड़ परिवार की तरफ से इस साल भी 8 जून से 9 जून के बीच नामपल्ली स्थित एग्जिबिशन ग्राउंड में आयोजित होगा। माना जाता है कि वर्षों से यह फिश प्रसाद ग्रहण करने से अस्थमा के रोगियों को खूब राहत मिली है।
प्रसाद बांटने वाले बठिनी गौड़ परिवार के अनुसार, कई वर्षों से यहां अस्थमा मरीजों के इलाज के लिए प्रसाद बांटा जाता है और इसे ग्रहण के लिए देशभर से लोग जुटते हैं। परिवार के सदस्य मत्स्य विभाग से एक विशेष मछली खरीदते हैं और इससे अस्थमा के मरीज का इलाज करते हैं। इसके लिए मछली को एक पीले पेस्ट में लपेटकर मरीज के मुंह में डालते हैं जिसे मरीज को जिंदा निगलना होता है।

कैसे काम करता है 'फिश प्रसादम'
गौड़ परिवार के सदस्यों के मुताबिक फिश प्रसादम में मरीज को एक विशेष पीले पेस्ट लगी हुई स्नेकहेड म्यूलर जिंदा मछली निगलने को कहा जाता है। इसे निगलने से गले में छटपटाहट सी होती है ऐसे में पीला पेस्ट मरीज के श्वसन प्रक्रिया को बाधित नहीं नहीं करती है। इस पीले पेस्ट की रेसिपी करीब 173 साल पुरानी है। जो कि बठिनी गौड़ परिवार की सीक्रेट रेसिपी है। 1845 में एक संत ने इसकी रेसिपी इस परिवार के संग शेयर की थी, तब से लेकर आज तक इस रेसिपी का इस्तेमाल जनहित के लिए किया जा रहा है।
बठिनी गौड़ परिवार हर साल अस्थमा के मरीजों को मुफ्त में इस प्रसादम को बांटता हैं और बीमारी के पूरी तरह ठीक होने के लिए लगातार तीन साल तक इस 'दवा' को ग्रहण करने के लिए कहता है। हालांकि इसकी लोकप्रियता और इसे ग्रहण करने के बाद कई लोगों को इस दवा से राहत मिली है। बावजूद इसके यह प्रसादम हमेशा बहस का विषय रही है। कई एक्सपर्ट का मानना है कि इलाज का यह तरीका ठीक नहीं हैं इसके कई साइडइफेक्ट भी हो सकते हैं। बेंगलुरु के एमडी रेस्पिरेटरी मेडिसिन और सीनियर कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजी डॉ. शिवकुमार का मानना है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो साबित कर दें कि इस तरह का इलाज का तरीका अस्थमा जैसी बीमारी को ठीक कर देगा।
अस्थमा क्या है?
डॉ. शिवकुमार के मुताबिक अस्थमा श्वसन प्रणाली से जुड़ी बीमारी है जो वायुमार्गों की सूजन और संकुचन की वजह से होती है, और इसके इलाज में आमतौर पर इन्हेलर, कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स और दवाइयां शामिल होती हैं जो सूजन को कम कर वायुमार्गों की रुकावट दूर कर इन्हें खोलने का काम करती है।
मछली प्रसादम के सेवन से संभावित खतरे
डॉ. शिवकुमार कहते हैं, अस्थमा के मरीजों के लिए मछली प्रसादम के सेवन से कई तरह के नुकसान हो सकते हैं-
एलर्जी रिएक्शन : कुछ अस्थमा के मरीजों को सी-फूड से एलर्जी हो सकती है। जो एलर्जी रिएक्शन को ट्रिगर कर अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती है।
इंफेक्शन का खतरा : मछली प्रसादम देने का तरीका दरअसल स्वच्छता संबंधी चिंताओं को बढ़ा देता है। इस इलाज में जीवित मछली को निगलना होता है। इसमें ग्लव्स या दूसरी हाइजीन उपायों का इस्तेमाल न करने से इंफेक्शन होने का खतरा भी रहता है।
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल खतरे: जीवित मछली को निगलने से संभावित रूप से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे दम घुटने या गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग जैसे खतरे भी हो सकते हैं।
डॉक्टर शिवकुमार के ने अस्थमा मरीजों को सलाह दी है कि वो एक्सपर्ट की बताई दवाओं को फॉलो करें और किसी भी वैकल्पिक उपचार के बारे में अपने डॉक्टर से जरुर बात करें।
आइए जानते हैं कि कैसे अस्थमा मरीजों को खुद का ध्यान रखना चाहिए-
- किसी भी वैकल्पिक उपचार लेने से पहले अपने डॉक्टर से जरुर बात करें कि यह सुरक्षित है या नहीं।
- अपनी अस्थमा की दवाओं को लेने से न चूंके।
- हमेशा मेडिकली अप्रूव्ड ट्रीटमेंट ही लें।
- अगर आप किसी तरह का वैकल्पिक उपचार ले रहे हैं तो अपने लक्षणों को मॉनिटर करें। कोई भी साइडइफेक्ट दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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