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ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग में जन्मजात विकार पैदा हो जाता है। इसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) कहा जाता है। इस विकार से प्रभावित बच्चों को सामाजिक संपर्क, व्यवहार और मेलजोल में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
फिल्म 'बर्फी' में प्रियंका चोपड़ा के किरदार को भी ऑटिज्म था, जिससे यह विकार आम लोगों के बीच अधिक चर्चा में आया। यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक स्थिति है जिसमें प्रभावित व्यक्ति दूसरों के साथ सहजता से घुलने-मिलने में असमर्थ रहता है।

विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस
हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों में ऑटिज्म के प्रति समझ बढ़ाना और इससे पीड़ित लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है। ऑटिज्म एक न्यूरोलॉजिकल विकार है, जिसके लक्षण बचपन में ही प्रकट होने लगते हैं। यह बीमारी मुख्य रूप से जेनेटिक कारणों से होती है और इससे पीड़ित व्यक्ति को सीखने, संवाद करने और कार्य करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
ऑटिज्म की पहचान और कारण
ऑटिज्म में कई प्रकार के लक्षण होते हैं, इसलिए इसमें 'स्पेक्ट्रम' शब्द जोड़ा गया है। पहले ऑटिज्म, एस्पर्जर सिंड्रोम और चाइल्डहूड डिसइंटीग्रेटिव डिसऑर्डर को अलग-अलग बीमारियों के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब इन्हें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के अंतर्गत रखा गया है।
इस विकार के सही कारणों का अब तक सटीक पता नहीं चल पाया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारणों का मिश्रण हो सकता है। कुछ मामलों में गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, विषैले पदार्थों के संपर्क में आना या दिमागी संरचना में असमानता इसकी वजह बन सकती है।
ऑटिज्म की शुरुआत
ऑटिज्म की पहचान कुछ बच्चों में एक साल की उम्र से ही हो जाती है, लेकिन 18 से 24 महीनों के बीच इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। इस अवधि के दौरान अगर इस विकार की पहचान कर ली जाए तो उचित प्रबंधन और उपचार के माध्यम से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
ऑटिज्म के लक्षण
अपने ही संसार में खोए रहना: ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे अपनी ही दुनिया में रहते हैं। वे बार-बार एक ही तरह की हरकतें दोहराते हैं और नाम पुकारे जाने पर प्रतिक्रिया नहीं देते।
सीखने में कठिनाई: ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को नई चीजें सीखने में कठिनाई होती है, लेकिन कुछ मामलों में उनकी सीखने की क्षमता असाधारण रूप से तेज भी हो सकती है।
आंखें न मिलाना: एक साल की उम्र के बाद भी अगर बच्चा लोगों की आंखों में आंखें डालकर नहीं देखता तो यह एक प्रमुख संकेत हो सकता है।
बौद्धिक क्षमता में अंतर: कुछ बच्चों की मानसिक क्षमता सामान्य से कम हो सकती है, जबकि कुछ में यह असामान्य रूप से अधिक हो सकती है। हालांकि, वे अपनी समझ को दूसरों के साथ साझा करने में असमर्थ होते हैं।
सामान्य गतिविधियों में परेशानी: ऐसे बच्चे दैनिक कार्यों को करने में भी कठिनाई महसूस कर सकते हैं।
अलग तरह की आवाज़: कई बच्चों में बोलने की समस्या होती है, जिससे वे रोबोट जैसी आवाज़ में बात करने लगते हैं। प्रियंका चोपड़ा ने 'बर्फी' फिल्म में इसी तरह की आवाज़ में संवाद बोले थे।
ऑटिज्म का उपचार
ऑटिज्म का शत-प्रतिशत इलाज संभव नहीं है, लेकिन अगर शुरुआती स्तर पर इसे पहचानकर सही दिशा में प्रयास किए जाएं तो स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए कई स्तरों पर उपचार की आवश्यकता होती है।
व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक थेरेपी: साइकोथेरेपी और बिहेवियरल थेरेपी बच्चों को सामाजिक और संचार कौशल विकसित करने में मदद करती हैं।
परिवार और स्कूल का सहयोग: माता-पिता और शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे बच्चों की मदद कर सकें।
दवाओं का प्रयोग: कुछ मामलों में डॉक्टर विशेष दवाओं की सिफारिश कर सकते हैं, जो बच्चे के व्यवहार और ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकती हैं।
स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी: बोलने और दैनिक कार्यों को करने की क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष चिकित्सा दी जाती है।
अगर माता-पिता अपने बच्चे में ये लक्षण देखें, तो उन्हें बिना देरी किए विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। जल्दी पहचान और सही इलाज से बच्चे का जीवन आसान बनाया जा सकता है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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