Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha: संकष्टी चतुर्थी पर जरूर सुनें और पढ़ें अखुरथ व्रत कथा, पाएं आशीर्वाद

Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha In Hindi: अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश के अखुरथ स्वरूप को समर्पित है। मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी पर अखुरथ गणपति की विधि-विधान से पूजा और व्रत कथा सुनने-पढ़ने से जीवन के हर संकट दूर होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आज यानी 7 दिसंबर 2025, दिन रविवार को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा जा रहा है। इस दिन श्रद्धा से व्रत रखने वाला भक्त ज्ञान, बुद्धि, सौभाग्य तथा सफलता का वरदान प्राप्त करता है।

ज्योतिष और पुराणों के अनुसार, कथा सुने बिना संकष्टी चतुर्थी व्रत अधूरा माना जाता है। इसलिए इस शुभ अवसर पर अखुरथ गणेश जी की पावन व्रत कथा अवश्य पढ़नी चाहिए।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

पुराणों के अनुसार बहुत समय पहले प्राचीन काल में राजा अम्बरीष नाम के धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। वे सदैव प्रजा के हित, धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते थे। उनके राज्य में सुख, समृद्धि और शांति थी, परंतु एकमात्र दुख यह था कि उन्हें पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य नहीं मिला था। पुत्र प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेक व्रत-उपवास, यज्ञ-हवन और पूजा की, परंतु मनोकामना पूर्ण नहीं हुई।

एक दिन महर्षि नारद राजा के महल में पधारे। राजा ने विनम्र भाव से उनसे पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। तब महर्षि नारद बोले -'हे राजन! संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के अखुरथ स्वरूप का व्रत एवं कथा करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। आप पूरे नियम-संयम से यह व्रत करें, निश्चित ही पुत्र प्राप्ति होगी।'

राजा अम्बरीष ने श्रद्धा और अखंड विश्वास के साथ व्रत प्रारंभ किया। संकष्टी चतुर्थी के दिन उन्होंने गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की, चंद्र दर्शन कर व्रत का समापन किया और अखुरथ व्रत कथा सुनी। व्रत समाप्त होते ही उनके जीवन की दिशा बदल गई - रानी के गर्भ से एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र का जन्म हुआ।

राज्य में हर्ष का माहौल छा गया और राजा ने गणेश जी की कृपा के लिए भव्य पूजा का आयोजन कराया। तब से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि संकष्टी चतुर्थी पर अखुरथ गणपति की पूजा और व्रत कथा सुनने से जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर हो जाते हैं और हर मनोकामना पूर्ण होती है।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व (Significance)

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के अखुरथ स्वरूप की आराधना का दिन है। इस व्रत को करने से-

जीवन से सभी प्रकार के संकट और कष्ट दूर होते हैं
मनोकामनाएं पूरी होती हैं
कार्यों में बाधाएं समाप्त होती हैं
स्वास्थ्य, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है
ग्रहदोष और पितृदोष के प्रभाव कम होते हैं
संतान सुख और पारिवारिक सुख बढ़ता है

शास्त्रों में कहा गया है कि- संकष्टी चतुर्थी पर व्रत और कथा के बिना पूजा अधूरी रहती है। इसीलिए इस दिन व्रत कथा का श्रवण/पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि (Puja Vidhi / Step-by-step)

प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें विशेषकर अखुरथ स्वरूप।

पूजा सामग्री में पीला वस्त्र, अक्षत, रोली, मोदक, दूर्वा घास, पंचामृत, धूप, दीप, घी, कपूर, फल, नैवेद्य, गन्ना या गुड़ रखें।

चांद की पूजा के लिए अर्घ्य पात्र लें और दीपक जलाकर संकल्प लें।

गणेश जी को स्नान अभिषेक कराएं इसके लिए पानी, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल लें।

गणेश जी को वस्त्र अर्पित करें और मौली बाँधें।

रोली-अक्षत-दूर्वा घास अर्पित करें (21 दूर्वा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं)।

मोदक, लड्डू, फल और नैवेद्य चढ़ाएं।

गणेश मंत्र, स्तोत्र या चालीसा का पाठ करें "ॐ गण गणपतये नमः" 108 बार जप अत्यंत शुभ।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें / सुनें।

अंत में आरती करें और प्रसाद बांटें।

संध्या के समय चंद्रमा को अर्घ्य देना अनिवार्य है।

इसके बाद ही व्रत का पारण (समापन) किया जाता है।

मोदक या गुड़-मूंगफली खाकर व्रत खोलना शुभ माना गया है।

Story first published: Sunday, December 7, 2025, 8:00 [IST]
Desktop Bottom Promotion