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अर्थी को शमशान ले जाने से पहले रोककर क्यों देते हैं विश्राम? गरुड़ पुराण में मिलता है इसका रहस्य
Arthi Ko Shamshan Le Jane Se Pehle Aaram Kyu Dete Hai: शव को श्मशान ले जाते समय रास्ते में ही आराम दिया जाता है। इस प्रथा की जड़ें प्राचीन हिंदू ग्रंथ गरुड़ पुराण में हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के शव को अर्थी में ले जाया जाता है, तो उसे सीधी अवस्था में सुलाते हैं और उसका सिर आगे और पीछे पैर होता है। घर से निकालने के पश्चात बीच रास्ते में थोड़ा सा विश्राम दिया जाता है। ताकि इस माया भरे संसार को एक बार मन भर के अंतिम चरण में देख सके।
इसके पश्चात मृत शरीर की दिशा को परिवर्तित कर दिया जाता है। इसके बाद पैर आगे और सिर पीछे रख देते हैं। ताकि उसका मुंह उसके अंतिम गंतव्य की ओर हो। दिशा में यह बदलाव यह दर्शाता है कि मृतक का अब इस दुनिया से कोई संबंध नहीं है और अब उसे परलोक की ओर अपनी यात्रा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

श्मशान की यात्रा के दौरान, अर्थी को पीपल के पेड़ के नीचे या बेलपत्र के वृक्ष या उसके पत्ते के ऊपर रखने की प्रथा है। शरीर को आराम देने का यह कार्य एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि सभी चीजों को अंततः समाप्त होना ही है। हमारा भौतिक रूप भी अस्थायी है। पीपल के पेड़ या बेलपत्र वृक्ष द्वारा प्रदान की गई छाया इस दुनिया में मृतक को होने वाले किसी भी नुकसान से सुरक्षा का भी प्रतीक है। साथ ही सभी देवी देवताओं के आशीर्वाद के लिए भी अर्थी को वृक्ष के नीचे रखा जाता है।
निष्कर्ष के तौर पर, शव को श्मशान ले जाने से जुड़ी इन रस्मों का गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। ये हमारी नश्वरता की याद दिलाते हैं और हमें शोक मनाने और नुकसान को स्वीकार करने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करने में मदद करते हैं।
रास्ते में अर्थी दिखना शुभ या अशुभ
अगर हम कहीं सफर कर रहे हैं तो रास्ते में अर्थी देखना बेहद ही शुभ संकेत माना जाता है। अर्थी दिखे तो वहीं रुक कर हाथ जोड़कर मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिए और मृतक की आत्मा के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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