Dua e Ashura: मुहर्रम महीने की आशूरा पर पढ़ी जाती है ये खास दुआ, जानें 'यौमे आशूरा' के अमल और इबादतें

Dua e Ashura: मुहर्रम का महीना इस्लामी कैलेंडर का पहला और सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह केवल एक नया साल नहीं होता, बल्कि एक आत्मचिंतन और इबादत का समय भी होता है। मुहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे "यौमे आशूरा" कहा जाता है, इस्लामी इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाती है। खासतौर पर कर्बला की जंग में हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी।

इस दिन पढ़ी जाने वाली विशेष दुआ को दुआ-ए-आशूरा (Dua e Ashura) कहा जाता है, जो तौबा, सब्र और अल्लाह की रहमत की तलाश का प्रतीक है। यह दुआ न केवल इबादत का एक माध्यम है, बल्कि इंसानियत, सच्चाई और कुर्बानी की मिसाल भी है।

Dua e Ashura

दुआ-ए-आशूरा क्या है?

दुआ-ए-आशूरा एक विशेष दुआ है जो 10 मुहर्रम को पढ़ी जाती है। यह अल्लाह से माफी, रहमत और सुरक्षा की गुजारिश करती है। इस दुआ में इंसान अपने गुनाहों को कबूल करता है और अल्लाह की मदद चाहता है। नीचे दुआ-ए-अशूरा दी गई है-

اللّهُمَّ اجْعَلْنِي فِي هَذَا الْيَوْمِ مِنَ الْمُسْتَغْفِرِينَ، وَاجْعَلْنِي فِيهِ مِنْ عِبَادِكَ الصَّالِحِينَ الْقَانِتِينَ، وَاجْعَلْنِي فِيهِ مِنْ أَوْلِيَائِكَ الْمُقَرَّبِينَ، بِرَأْفَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम या क़ाबि ल तौबति आदमा यौमा आशूराअ या फारिजा करबी ज़िन्नूनी यौमा आशूराअ या जामी अ़ शमली याक़ूबा यौमा आशूराअ या सामी अ़ दाअ़वती मूसा व् हारूना यौमा आशूराअ

दुआ-ए-अशूरा का हिंदी अर्थ क्या है?

"ऐ अल्लाह! मुझे इस दिन अपने उन बंदों में शामिल कर ले जो तुझसे तौबा और माफी मांगते हैं, और उन्हें जो तेरे नेक, आज्ञाकारी और करीब हैं। ऐ सबसे ज्यादा रहम करने वाले, मुझे अपने करम से नवा दे।"

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दुआ-ए-आशूरा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

कर्बला की जंग में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने जुल्म के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। आशूरा का दिन इस बलिदान की याद में मनाया जाता है। हदीसों के अनुसार, इस दिन रोजा रखने और इबादत करने से कई गुना अधिक सवाब मिलता है।

दुआ-ए-आशूरा पढ़ने का सही समय और तरीका

यह दुआ 10 मोहर्रम को सूरज निकलने के बाद से लेकर सूरज ढलने से पहले पढ़ी जाती है। वुजू करके शांत और पाक दिल से इसे पढ़ा जाता है। दुआ के दौरान अल्लाह की रहमत, हजरत हुसैन की कुर्बानी और इंसानियत के लिए दुआ मांगी जाती है।

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यौमे आशूरा पर अन्य इबादतें

रोजा रखना: 9 और 10 मुहर्रम के रोजे की हदीसों में बड़ी फजीलत आई है।
तस्बीह और इस्तगफार: अल्लाह से माफी मांगने और सब्र की दुआ।
सदका देना और जरूरतमंदों की मदद करना।

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दुआ-ए-आशूरा से मिलने वाली फजीलतें

गुनाहों की माफी
मन की शांति और सब्र
विपत्तियों से सुरक्षा
अल्लाह की रहमत और बरकत

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