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Sri Hanuman Tandav Stotram: अत्यंत दुर्लभ स्तोत्र है श्री हनुमान तांडव स्तोत्र, इसके जाप से मिलेंगे अनगिनत लाभ
राम भक्त हनुमान को कलयुग का देवता माना गया है। लोगों की आस्था है कि वो हमारे आसपास पृथ्वी लोक में ही हैं। वह संकट की घड़ी में अपने भक्तों की रक्षा के लिए स्वयं पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि श्रद्धालु भी उन्हें प्रसन्न करने का कोई मौका और तरीका नहीं छोड़ते हैं।
माना जाता है कि कुछ विशेष दिनों पर जो जातक पूरे विधि विधान से बजरंगबली की पूजा करता है, उसके जीवन के सारे कष्ट टल जाते हैं। श्री राम के अनन्य भक्त हनुमान अपने श्रद्धालुओं पर कृपा दृष्टि बनाये रखते हैं।

आज हम आपको श्री हनुमान तांडव स्तोत्र के बारे में बता रहे हैं। माना जाता है कि भगवान बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए इसका पाठ बहुत असरकारी होता है। जातकों को सही उच्चारण के साथ श्री हनुमान तांडव स्तोत्र का पाठ करने की सलाह दी जाती है। रोजाना इसका जाप करने से बजरंगबली का आशीर्वाद मिलता है।
यह भी माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से कुंडली में ग्रहों की स्थिति में भी सुधार आता है। जातक को मंगल, राहु जैसे ग्रहों के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है। साल 2023 का ज्येष्ठ महीना शुरू हो चुका है। इस माह के सभी मंगलवार को बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल के नाम से जाना जाता है। हनुमान भक्तों के लिए ये दिन विशेष महत्व रखता है। ज्येष्ठ माह के मंगलवारों को सच्चे मन से बजरंगबली की उपासना करें और श्री हनुमत तांडव स्तोत्र का पाठ करें।
श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम्:
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् ।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न ।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥

सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् ।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् ।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् ।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः ।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः ।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे ।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥
ॐ इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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