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Buddha Purnima Death: गौतम बुद्ध की अस्थियाँ मिलने की रोचक कहानी
आज बुद्ध पूर्णिमा है, वह दिन जब बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध ने गौतम रूप में जन्म लिया था। मान्यता अनुसार कुछ वर्षों बाद इसी दिन उनको बोधिसत्व वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उसके बाद अपने संदेशों, अपने अहिंसात्मक विचारों के ज़रिये उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की।
अंग्रेज़ी शासनकाल के दौरान एक कुली को टूटे घड़े में कुछ अवशेष मिले जिसकी पुष्टि करके यह पता लगाया गया कि वे महात्मा बुद्ध के अवशेष हैं।

483 ईसा पूर्व में महात्मा बुद्ध ने मोक्ष प्राप्ति की थी जिसके बाद उनके शिष्यों ने अवशेषों को विभाजित कर अलग अलग बौद्धिक मूल्य के स्थानों पर संग्रहित किया था। यह अवशेष बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बहुमूल्य माने जाते हैं।
जानते हैं महात्मा बुद्ध ने कैसे त्यागे थे प्राण और आधुनिक समय में उनके अवशेषों को कैसे पाया गया, इसकी कहानी -
बुद्ध के मोक्ष प्राप्ति और 8 बौद्ध स्तूपों की कहानी
बौद्ध मान्यता के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध को मोक्ष प्राप्ति हुई। बुद्ध ने अपने अनुयायियों को उनके दाह संस्कार के निर्देश दिए थे। उनके अनुयायियों के बीच बुद्ध के प्रति आस्था के कारण उनके अवशेषों को लेने की इच्छाएं थी, जिस कारण 8 अनुयायियों ने बुद्ध के अवशेषों को बांटा।
दाह संस्कार से पहले सात दिनों तक महात्मा बुद्ध के शरीर को एक ताबूत में रखा गया। उसके बाद उस ताबूत को उनके शिष्य महाकश्यप ने अग्नि दी। अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेषों को एकत्र करके आठ भागों में विभाजित किया गया, जिन्हें मगध के अजातशत्रु, वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, कुशीनगर के मल्ल, अल्लकप्पा के बुलीज, पावा के मल्ल, रामग्राम के कोलिया और वेथादिपा के एक ब्राह्मण के बीच वितरित किया गया।
इन 8 शिष्यों ने अपने अपने तरीकों से बुद्ध के अवशेषों को संग्रहित किया था। आगे चलकर इनके प्रतीक के रूप में 8 प्रमुख बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया गया, जिनमें से 7 स्तूप सम्राट अशोक ने बनवाएं।
मान्यता अनुसार सम्राट अशोक ने अपने जीवन काल में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए 84000 स्तूपों के निर्माण का उद्देश्य रखा था। भारत के सांची, सारनाथ, बोधगया, भरहुत क्षेत्रों में ये स्तूप पाए जाते हैं। इन स्तूपों के भीतर बुद्ध या महान शिष्यों एवं भिक्षुओं के अवशेषों को रखा गया।
कपिलवस्तु में बौद्ध अवशेषों की खोज
वर्ष 1898 में उत्तर प्रदेश के पिपरहवा क्षेत्र में एक उत्खनित ताबूत की खोज की गई जिससे वहां पहले स्थापित प्राचीन कपिलवस्तु प्रांत की पुष्टि हुई। इन ताबूतों पर बौद्धिक शिलालेख प्राप्त हुए। इसके बाद 1971-77 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग ने भी इसी स्थान पर खुदाई कर 2 और ताबूतों को हासिल किया जिनमें बुद्ध समेत उनके शिष्यों के भी अवशेष मिलें। अब इन अवशेषों और ताबूतों को राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है।

जब एक कुली को नागार्जुनकुंडा में मिला था अवशेषों से भरा घड़ा
ब्रिटिश शासन के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी के नागार्जुनकुंडा में बौद्ध महाचैत्य के पश्चिमोत्तर हिस्से से एक कुली को छोटा सा टूटा हुआ घड़ा मिला था। इस घड़े में कुछ अस्थि अवशेष थे, जिसकी जांच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने करवाई और यह पता लगा कि ये महात्मा बुद्ध के ही अवशेष हैं।
इसके बाद उस जगह पर पुरातत्व विभाग के दक्षिणी सर्कल के तत्कालीन अधीक्षक ए.एच. लांगहर्स्ट ने 1926 से 1931 के बीच खुदाई करायी थी, जिसमें महात्मा बुद्ध से जुड़े 'महाचैत्य' की बात सामने में आई थी। लांगहर्स्ट ने अपनी रिपोर्ट 'द बुद्धिस्ट एंटीक्विटीज़ ऑफ़ नागार्जुनकुंडा' में इस बात का ज़िक्र भी किया कि बुद्ध के ये अवशेष महास्तूप के बीचोबीच स्थान के बजाय पश्चिमोत्तर दिशा में रखे गये थे, जहां से उस कुली को वे प्राप्त भी हुए थे। इसी करण खजाने को लूटने आए लोगों की नज़रों से वे अवशष बच गये थे। रिपोर्ट के अनुसार खुदाई में कुछ गहने, मञ्जूषा, मोती और अन्य आभूषण भी मिले।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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