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Dhundiraj Chaturthi Vrat Katha: ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, दूर होंगे जीवन के सभी कष्ट
Dhundiraj Chaturthi Vrat Katha: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता यानी विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। किसी भी शुभ काम को शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। सनातन धर्म में भगवान गणेश को कई व्रत समर्पित हैं, जिसमें से एक है गणेश चतुर्थी का व्रत। पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। मत्स्यपुराण में इसे मनोरथ चतुर्थी के नाम से वर्णित किया गया है। इस दिन भगवान श्री गणेश के ढुण्ढिराज स्वरुप की पूजा की जाती है। ढुण्डिराज का अर्थ है वह देवता जो भक्तों के कष्टों और विघ्नों को खोजकर दूर करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत रखने से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस बारढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत 21 फरवरी 2026, शनिवार को रखा जा रहा है। इस दिन शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा करने के साथ-साथ व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। तो आइए, जानते हैं ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत की कथा के बारे में -

ढुण्ढिराज चतुर्थी की पूजा का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 20 फरवरी को दोपहर 2 बजकर 38 मिनट से शुरू होगी। वहीं, इसका समापन 21 फरवरी को दोपहर 1 बजे होगा। ऐसे में, विनायक चतुर्थी का व्रत 21 फरवरी 2026 को किया जाएगा।
चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 27 मिनट से दोपहर 01 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 05 बजकर13 मिनट से सुबह 06 बजकर 04 मिनट तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 12 बजकर12 मिनट से दोपहर 12 बजकर 58 मिनट तक
सायाह्न सन्ध्या- शाम 06 बजकर15 मिनट से शाम 07 बजकर 31 मिनट तक
वर्जित चन्द्रदर्शन का समय- सुबह 08 बजकर 56 मिनट से रात 10 बजकर 16 मिनट तक
ढुण्ढिराज चतुर्थी की व्रत कथा (Dhundiraj Chaturthi Vrat Katha in Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय भगवान शिव के मन में यह विचार आया कि वे काशी को अपना स्थायी निवास बनाएं। उस समय काशी पर राजा दिवोदास का शासन था, जो अत्यंत धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि की कोई कमी नहीं थी और प्रजा पूर्ण रूप से संतुष्ट थी।
राजा दिवोदास को ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि जब तक उनके राज्य में किसी प्रकार की कमी या अव्यवस्था नहीं होगी, तब तक कोई भी देवता वहां प्रवेश नहीं कर सकेगा। शिव जी को काशी अत्यंत प्रिय लगी, इसलिए उन्होंने वहां की स्थिति जानने के लिए अपने पुत्र गणेश जी को भेजने का निश्चय किया।
काशी पहुंचने से पहले गणेश जी ने एक ज्योतिषी का वेश धारण किया और स्वयं को 'ढुण्ढि' नाम से परिचित कराया। अपनी तीव्र बुद्धि और ज्ञान के बल पर उन्होंने शीघ्र ही काशीवासियों का विश्वास जीत लिया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति पूरे नगर में फैल गई। परिणामस्वरूपऔर राजा दिवोदास के शासन में कमी आने लगी। ऐसी में भगवान शिव के लिए काशी में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हो गया।
जब शिव जी काशी आए, तो उन्होंने प्रसन्न होकर गणेश जी को 'ढुण्ढिराज' नाम से पुकारा। साथ ही यह आशीर्वाद दिया कि जो भी श्रद्धालु काशी की यात्रा करेगा, उसकी तीर्थयात्रा ढुण्ढिराज गणेश की पूजा करने के बाद ही पूरी होगी। मान्यता है कि जिस दिन शिव जी ने गणेश जी को 'ढुण्ढिराज' का नाम दिया था, वह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि थी। तभी से इस पावन तिथि को 'ढुण्ढिराज चतुर्थी' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हो गई।



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