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Durga Ashtami 2025 Sanskrit Wishes: दुर्गाष्टमी पर संस्कृत के इन श्लोकों से दें अपनों को शुभकामनाएं
Durga Ashtami Greetings in Sanskrit: आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का पावन पर्व चैत्र नवरात्रि इस वर्ष 30 मार्च 2025 से आरंभ हो चुका है, जबकि दुर्गाष्टमी का पर्व 5 अप्रैल को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह नौ दिवसीय उत्सव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक चलता है। प्रतिपदा के दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर देवी दुर्गा का आह्वान किया जाता है। इस बार नवरात्रि आठ दिनों की है।
इस शुभ अवसर पर दुर्गाष्टमी पर प्रियजनों को संस्कृत श्लोक, व्हाट्सऐप मैसेजेस और फेसबुक ग्रीटिंग्स भेजकर "नवरात्रयोः शुभाशयाः" कहें और मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करें। जय माता दी!

संस्कृत में दुर्गाष्टमी की शुभकामनाएं (Durga ashtami greetings in Sanskrit)
1. ॐ सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्रयम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते !!
भावार्थ : इसका हिन्दी अर्थ यह है कि :- नारायणी तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो, कल्याणदायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। हे माँ दुर्गा आपके श्री चरणों में नमस्कार है।
2. या देवी सर्वभूतेषु.. शक्तिरूपेण संस्थिता: नमस्तस्यै.. नमस्तस्यै.. नमस्तस्यै नमो नम:
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
भावार्थ : या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।
3. या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
4. जातवेदसे सुनवाम् सोमरमरत्यतो निदहति वेदाः ।
स नः पर्षदति दुर्गानि विश्वा नवेव सिन्धुं दुरितात्याग्निः ॥1॥
भार्वाथ: हम जातवेदस (अग्निदेव) के लिए सोम (अमृत) का पान करते हैं, जो पापों को जला देता है। वह (अग्निदेव) हमारी नाव की तरह, सभी दुखों और दुष्टियों से पार कराता है, जैसे कि सिंधु (समुद्र) में नाव पार कराती है"
5. कर्मफलेषु जुष्ठाम् । दुर्गां देवींशरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तारसे नमः ॥2॥
6. अग्ने त्वं पराया नव्यो अस्मां स्वस्तिभिर-अति दुर्गानि विश्वा |
पूष-च पृथ्वी बहुला न उर्वि भव टोकाया तनयाया शाम्योह ||3||
7. नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
भावार्थ: उन देवी को नमन है जो देवियों की देवी हैं. जो शिव की प्रिया हैं, उन देवी के हम शरणागत हैं, उन्हें वंदन है, जो सृष्टि में प्रकृति स्वरूप में व्याप्त हैं और जो मंगलदायिनी हैं।
8. बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे।
मूढत्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥
भावार्थ: आप मुझे बुद्धि दें, कीर्ति दें, कवित्वशक्ति दें और मेरी मूढ़ता का नाश करें, आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।
9.नमो देवी महाविधे नमामि चरणौ तव।
सदा ज्ञानप्रकाशं में देहि सर्वार्थदे शिवे।।
भावार्थ: हे देवी! आपको नमस्कार है, हे महाविधे, मैं आपके चरणों में बार-बार नमन करता हूं. सर्वार्थदायिनी शिवे, आप मुझे सदा ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान कीजिए।



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