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Happy Teachers Day Shlok: गुरु की महिमा वंदना के लिए बेस्ट हैं ये संस्कृत श्लोक, टीचर्स के साथ करें शेयर
Sanskrit Slokas on Guru Teacher's Day: जो अन्धकार से प्रकाश की और ले जाने का मार्गदर्शन करे वो गुरु है। गुरु का स्थान भगवान् से भी ऊपर माना जाता है क्योंकि भगवान् से परिचय भी गुरु ही करवाते हैं।
गुरु चाणक्य ने शिक्षक का महत्व बताते हुए कहा था कि शिक्षक में वो शक्ति है कि वो अपना पालन करने वाला सम्राट खुद तैयार कर सकता है। निर्माण और प्रलय शिक्षक की गोद में खेलते हैं।

आधुनिक युग में शिक्षक की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है क्योंकि ज्ञान और सूचना का समुद्र अब सबके लिए उपलब्ध है जिसकी वजह से उचित मार्गदर्शन के आभाव में लोग मार्ग भटक भी रहे हैं। गुरु की कृपा से सही मार्गदर्शन मिलता रहे इसलिए गुरु की कृपा प्राप्त हो यह जरुरी है। शिक्षक दिवस (Teachers Day) के दिन हम शेयर कर रहे हैं संस्कृत के कुछ चुनिन्दा श्लोक जिससे आप लाभान्वित हो सकते हैं।
1.
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥
बहुत ज्यादा बोलने से कुछ नहीं मिलता, करोड़ों शास्त्रों को पढ़ लेने मात्र से कुछ नहीं होता, सबसे बड़ी बात है मन की शांति। जब तक परम शांति ना मिले तो समझिये कुछ नहीं मिला और परम शान्ति बिना गुरु के नहीं मिल सकती।
2.
दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥
जैसे बिना दूध के गाय, बिना फूल के पेड़, बिना लज्जा के पत्नी, बिना कमल फूल के जल, बिना शम के विद्या और बिना लोगों के शहर शोभा नहीं देते, वैसे ही बिना शिक्षक या गुरु के शिष्य की भी शोभा नहीं है। शिष्य की योग्यता और सफलता उसके शिक्षक पर निर्भर है।
3.
एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् ।
पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत् ॥
इस श्लोक में गुरु के लक्षण बताये गए हैं। लक्ष्यविहीन, भोगी, संचय करने वाला, ब्रह्मचर्य का पालन ना करने वाला और झूठ बोलने वाला व्यक्ति सही गुरु हो ही नहीं सकता। गुरु का एक लक्ष्य जरुर होता है और वो भोगी प्रवृति का नहीं होता।
4.
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् ।
अथा प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
जैसे राजा दुष्टों पर शासन करता है, पापी लोगों पर यम शासन करता है वैसे ही जिनकी आत्मा जागृत हो सकने लायक है उन पर एक गुरु शासन करता है। जागृत होने का सम्बन्ध यहां अध्यात्म से है।
5.
विना गुरुभ्यो गुणनीरधिभ्यो
जानाति तत्त्वं न विचक्षणोऽपि ।
आकर्णदीर्घायित लोचनोऽपि
दीपं विना पश्यति नान्धकारे ॥
बड़ी से बड़ी आँख रहने के बावजूद बिना प्रकाश के मनुष्य कुछ नहीं देख सकता, वैसे ही मनुष्य कितनी भी विलक्षण प्रतिभा का स्वामी क्यों ना हो, बिना गुरु के उसे गूढ़ ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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