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16 या 17 जुलाई, कब मनाया जाएगा हरेला? जानें किस दिन बोएं बीज, क्या है इस पर्व का धार्मिक महत्व?
Harela 2026 Kab Hai: उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला प्रकृति, हरियाली और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। हर साल सावन संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व लोगों के जीवन में सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस बार कई लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि हरेला 16 जुलाई को मनाया जाएगा या 17 जुलाई को? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस वर्ष हरेला 16 जुलाई को मनाया जाएगा, जबकि इसकी तैयारी 9 दिन पहले यानी 7 जुलाई से शुरू हो जाती है। आइए जानते हैं हरेला की सही तिथि, बीज कब बोए जाते हैं, इसे मनाने की परंपरा और इसका धार्मिक महत्व।

2026 में हरेला कब है?
इस वर्ष हरेला पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा। यह पर्व सावन संक्रांति के दिन मनाया जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है, जहां लोग इसे प्रकृति और कृषि से जुड़े सबसे बड़े लोकपर्वों में से एक मानते हैं।
हरेला के बीज कब बोए जाते हैं?
हरेला की शुरुआत मुख्य पर्व से 9 दिन पहले होती है। इस वर्ष 7 जुलाई को हरेला बोया जाएगा। इस दिन घर के किसी शुभ स्थान पर मिट्टी से भरे पात्र, टोकरी या बांस की डलिया में बीज बोए जाते हैं।
हरेला में कौन-कौन से बीज बोए जाते हैं?
परंपरा के अनुसार, हरेला में 5 या 7 प्रकार के अनाज बोने की परंपरा है। इनमें सामान्यतः शामिल होते हैं-
गेहूं
जौ
धान
मक्का
गहत (कुल्थी)
उड़द
सरसों (कुछ स्थानों पर)
इन बीजों को मिट्टी में बोकर हल्का पानी दिया जाता है और पात्र को छायादार स्थान पर रखा जाता है।
9 दिनों तक कैसे की जाती है हरेला की देखभाल?
बीज बोने के बाद अगले नौ दिनों तक उन्हें प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पानी दिया जाता है। अंधेरे या छायादार स्थान पर रखने से इनमें हरे-भरे अंकुर निकल आते हैं। इन्हीं को हरेला कहा जाता है। होने को तो इसका नाम हरेला है लेकिन ऐसा माना जाता है कि हरेले के पत्तों में थोड़ा पीलापन आ जाए तो वो शुभ संकेत होता है।
हरेला वाले दिन क्या किया जाता है?
मुख्य पर्व के दिन यानी 16 जुलाई को उगे हुए हरे पौधों को सावधानी से काटा जाता है। परिवार के बड़े सदस्य इन्हें घर के सभी सदस्यों के सिर, कान या कंधे पर रखकर सुख, समृद्धि, लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।इसके बाद मंदिर में पूजा की जाती है और कई स्थानों पर पौधारोपण भी किया जाता है।
हरेला का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हरेला भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित पर्व माना जाता है। सावन मास भगवान शिव का प्रिय महीना होता है, इसलिए इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व नई फसल, हरियाली और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है हरेला
हरेला केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है। इस दिन उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को पेड़ लगाने और प्रकृति की रक्षा करने का संकल्प दिलाया जाता है।



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