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Rath Yatra: बीमार जगन्नाथ को दी जाती हैं ये पारंपरिक दवाएं, रथ यात्रा तक हो जाते हैं बिल्कुल स्वस्थ
पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा, जिसे एक रथ उत्सव के रूप में जाना जाता है, कुछ ही दिनों में शुरू होने वाली है। 12वीं शताब्दी से प्रचलित इस यात्रा का उल्लेख पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और स्कंद पुराण जैसे पवित्र हिंदू ग्रंथों में भी मिलता है।
इस साल यह यात्रा 20 जून 2023 को शुरू होगी और 1 जुलाई 2023 को इसका समापन होगा। इस यात्रा की रीतियों के अंतर्गत भगवान जगन्नाथ हर साल बीमार पड़ते हैं और कुछ कहानियों और किंवदंतियों के अनुसार, उन्हें पारंपरिक दवाएं दी जाती हैं और 15 दिनों तक इलाज चला, जिसके बाद भगवान पूरी तरह से ठीक हो गए।

कई पौराणिक कहानियों के अनुसार, भगवान जगन्नाथ त्योहार से ठीक पहले हर 15 दिन में बीमार पड़ते हैं। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन, भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र को मंदिर से बाहर लाया जाता है और ठंडे पानी में पवित्र स्नान कराया जाता है। इसे स्नाना यात्रा दिवस के नाम से जाना जाता है। इससे भगवान जगन्नाथ को बुखार हो जाता है और वे 15 दिनों तक अपने शयन कक्ष में विश्राम की मुद्रा में रहते हैं।
जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा बीमार हो जाते हैं, तो ओडिशा के पुरी में स्थित मंदिर में एक विशेष अनुष्ठान किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान और उनके भाई-बहन 14 दिनों के अनासार अनुष्ठान से गुजरते हैं, जिसमें उन्हें बीमारी से ठीक होने तक अलग रखा जाता है। इस चरण के दौरान, भक्त न तो मंदिर में घंटी बजा सकते हैं और न ही उन्हें देवताओं के दर्शन करने की अनुमति है।
भगवान का विशेष ध्यान रखा जाता है और उन्हें 15 दिनों तक साधारण भोजन, आमतौर पर खिचड़ी और पारंपरिक आयुर्वेदिक या हर्बल दवाएं दी जाती हैं। साथ ही सोने से पहले उन्हें दूध चढ़ाया जाता है और ठंडा लेप भी लगाया जाता है। इसे अनासार काल कहा जाता है और इस दौरान भक्तों को भगवान के दर्शन करने की अनुमति नहीं होती है। आइए भगवान् जगन्नाथ को दी जाने वाली उन पारंपरिक औषधियों के बारे में विस्तार से जानते हैं-
1. 'दशमूल' और 'पना भोग'
इन दिनों अनुष्ठान के एक भाग के रूप में भगवान को फल और जल चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि दशमूला औषधियां ठीक होने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अलावा, क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों ने सेवादारों के हवाले से कहा था कि झुना, कैंथा अथा जैसी दवाएं आवश्यक सामग्री हैं जो देवताओं की तबीयत ठीक करने के लिए उपयोग की जाती हैं।

2. 'फुलुरी तेला'
देवताओं के उपचार के लिए, फुलुरी तेल, जो एक विशेष तेल है, का उपयोग अनुष्ठान में किया जाता है। इसे सुगंधित हर्बल सामग्री जैसे चमेली, चंपा, चंदन पाउडर, कपूर, और अन्य का उपयोग करके तैयार किया जाता है। यह तेल देवताओं की लकड़ी की मूर्तियों पर लगाया जाता है।
3. 'कस्तूरी नाभि'
उपचार का एक और आश्चर्यजनक हिस्सा 'कस्तूरी नाभि' है। देवताओं की मूर्तियों को हर 8वें, 9वें या 12 वर्षों में केवल एक बार बदला जाता है, जो देवताओं के नवकलेवर को चिह्नित करता है। इन मूर्तियों को कीड़ों से बचाने के लिए ये लकड़ी से बनाई जाती हैं। इसके लिए कस्तूरी नाभी को नेपाल से लाकर इन मुर्तियो पर लगाया जाता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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