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Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी 10 रोचक बातें, जिनसे आज भी अनजान हैं कई लोग
Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल ओडिशा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है। इस साल जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से प्रारंभ हो रही है और इसका समापन 24 जुलाई को होगा। हर साल पुरी में आयोजित होने वाले इस भव्य आयोजन में लाखों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करते हैं। वहीं, करोड़ों लोग टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनते हैं। हालांकि, रथयात्रा सिर्फ भगवान के रथ खींचने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई ऐसी प्राचीन परंपराएं, धार्मिक मान्यताएं और दिलचस्प तथ्य जुड़े हैं, जिनके बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं होती। आइए, जानते हैं रथयात्रा से जुड़े ऐसे ही कुछ खास बातें -

1. भगवान केवल रथयात्रा के दौरान भक्तों के बीच आते हैं
श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पूरे वर्ष गर्भगृह में विराजमान रहते हैं। परंपरा के अनुसार केवल रथयात्रा के अवसर पर ही तीनों विग्रह मंदिर से बाहर निकलकर गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। धार्मिक मान्यता में इस यात्रा को भगवान के मौसी के घर जाने से भी जोड़ा जाता है।
2. हर रथ का निर्माण नए सिरे से होता है
रथयात्रा शुरू होने से पहले भगवान के तीनों रथ बिल्कुल नए बनाए जाते हैं। पिछले वर्ष के रथों का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता। निर्धारित परंपराओं के अनुसार विशेष प्रकार की लकड़ी से इनका निर्माण होता है और इस प्रक्रिया में कई अनुभवी शिल्पकार लंबे समय तक लगातार काम करते हैं।
3. तीनों रथों की पहचान अलग-अलग है
रथयात्रा में निकलने वाले तीनों रथ आकार और सजावट के साथ-साथ अपनी बनावट में भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 16 पहियों वाला होता है, भगवान बलभद्र का तालध्वज 14 पहियों पर चलता है, जबकि देवी सुभद्रा के दर्पदलन (देवदलन) रथ में 12 पहिए लगाए जाते हैं। प्रत्येक रथ का रंग, ध्वज और स्वरूप भी अलग होता है।
4. रथ खींचने की परंपरा का विशेष महत्व
रथयात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचने में भाग लेते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान की सेवा का अवसर माना जाता है। इसी वजह से हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस सेवा में शामिल होने की इच्छा रखते हैं।
5. स्नान के बाद कुछ दिनों तक नहीं होते दर्शन
रथयात्रा से पहले आयोजित स्नान पूर्णिमा पर भगवान का 108 कलशों के जल से विशेष अभिषेक किया जाता है। इसके बाद मान्यता है कि भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग 15 दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इस अवधि को अनसर कहा जाता है।
6. राजा भी निभाते हैं सेवक की भूमिका
रथयात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं। इस प्राचीन परंपरा को छेरा पहंरा कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह बताना है कि भगवान के सामने हर व्यक्ति समान है, चाहे वह राजा ही क्यों न हो।
7. भगवान की प्रतिमाओं का स्वरूप सबसे अलग
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं अन्य मंदिरों की मूर्तियों से अलग दिखाई देती हैं। इनकी बड़ी आंखें और विशिष्ट आकृति सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार इन्हें विशेष रूप में स्थापित किया गया था और यही स्वरूप आज तक कायम है।
8. वापसी से पहले गुंडिचा मंदिर में ठहरते हैं भगवान
रथयात्रा पूरी होने के बाद भगवान तुरंत मुख्य मंदिर नहीं लौटते। परंपरा के अनुसार तीनों देवता कुछ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजते हैं। इसके बाद उनकी वापसी यात्रा निकाली जाती है, जिसे बहुदा यात्रा कहा जाता है।
9. कई देशों में भी मनाया जाता है यह उत्सव
आज जगन्नाथ रथयात्रा केवल पुरी या भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में भी श्रद्धालु इसी परंपरा का पालन करते हुए रथयात्रा निकालते हैं। इस परंपरा को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने में इस्कॉन (ISKCON) का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
10. सभी के लिए समान है भगवान का दरबार
जगन्नाथ रथयात्रा का सबसे बड़ा संदेश समानता और सेवा की भावना है। इस उत्सव में जाति, धर्म, भाषा या सामाजिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। भगवान के दर्शन, रथ खींचने और सेवा का अवसर सभी श्रद्धालुओं के लिए समान माना जाता है।



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