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Jagannath Rath Yatra: मौसी के घर से लौटने के बाद होती है 'अधर पना' की रोचक रस्म
Adhara Pana: साल में एक बार निकलने वाली भगवान जगन्नाथ जी की यात्रा के चर्चे देश ही नहीं दुनिया में भी मशहूर हैं। सिलसिलेवार ढंग से इस भव्य यात्रा का इंतजाम और हर छोटी बड़ी रस्म का आयोजन किया जाता है।
इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं और कुछ दिन अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर में विश्राम करते हैं।

उड़ीसा के पुरी में यह यात्रा आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर निकलती है। वहीं दस दिनों के विश्राम के बाद भगवान के तीनों रथों को वापस जगन्नाथ जी के मुख्य मंदिर लाया जाता है और वहां अधर पना की रस्म पूरी की जाती है। आइये जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी यह अधर पना की रस्म क्या है और इसका क्या महत्व है।
अधर पना 2023 में कब है?
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन अधर पना का अनुष्ठान किया जाता है। इस साल यह 30 जून को पूरी की जाएगी।
अधर पना रस्म क्या है?
इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को तीन अलग अलग रथों में बिठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। सुना बेशा रस्म में तीनों भाई बहनों को सुनहरे पोशाक और आभूषण से सुसज्जित किया जाता है। इसके अगले दिन अधर पना रस्म होती है। इसमें मीठे पेय से भरे विशाल बर्तनों को रथों के ऊपर प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।
'नीलाद्रि बिजे' से पहले और 'सुना बेशा' के बाद, श्रीमंदिर के सिंह द्वार के पास खड़े भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों पर यह पेय अर्पित किया जाता है।

सावधानी के साथ तैयार किया जाता है ये पेय
जानकारी के अनुसार जिन बर्तनों का इस्तेमाल मीठा पेय रखने के लिए किया जाता है उनका निर्माण कुंभारपाड़ा के कुम्हारों द्वारा किया जाता है। इसके निर्माण के दौरान स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है। महिलाओं को इस पूजा से जुड़े किसी भी सामन को छूने की इजाजत नहीं होती है। इस पेय को तैयार करने के लिए दूध, चीनी, केला और कुछ मसालों का इस्तेमाल किया जाता है।
'अधारा पना' का मतलब क्या है?
सोडाशा उपचार पूजा के बाद तीनों देवी देवताओं को सुगंधित मीठा पेय अर्पित किया जाता है। मिट्टी से बने इन बर्तनों को इस तरह रखा जाता है जिससे कि वे देवताओं के होठों तक पहुंच जाए। दरअसल 'अधारा पना' रस्म में 'अधारा' का अर्थ है होंठ, और 'पना', का अर्थ है मीठा पेय।
प्रभु को इस पेय का भोग लगाने के बाद वहां मौजूद सेवक बहुत ही चालाकी से इस बर्तन को तोड़ देते हैं ताकि यह मीठा जल रथों में फ़ैल जाए। इस पेय को लोगों द्वारा उपभोग में नहीं लाया जाता है। यह केवल रथों पर सहायक देवताओं के लिए होता है जो यात्रा के समय में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की रक्षा करते हैं।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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