Janmashtami 2025 Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा है जन्माष्टमी व्रत? जानें कैसे करें ठाकुर जी की पूजा

Janmashtami 2025 Vrat Katha: भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन उपवास रखते हैं और आधी रात को ठाकुर जी का जन्मोत्सव मनाकर उन्हें झूला झुलाते हैं। मथुरा-वृंदावन में तो जन्माष्टमी के दिन जो रौनक होती है वो देखते ही बनती है। मान्यता है कि व्रत के साथ अगर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ न किया जाए तो व्रत अधूरा माना जाता है।

कथा सुनने और सुनाने से न केवल व्रत सफल होता है बल्कि श्री कृष्ण भक्तों की मनोकामनाएं भी पूरी करते हैं। आइए जानते हैं जन्माष्टमी व्रत कथा, महत्व और पूजा विधि।

जन्माष्टमी व्रत कथा का महत्व

जन्माष्टमी व्रत कथा सुनना/सुनाना व्रत का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इस कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। कथा सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है और भक्त को जीवन में सुख-समृद्धि, संतान सुख और संकटों से मुक्ति मिलती है। कथा के अंत में "जय श्रीकृष्ण" का कीर्तन करना अत्यंत शुभ होता है। ऐसे में जन्माष्टमी के दिन आप नीचे दी गई कथा को जरूर पढ़ें और सुनें। शास्त्रों के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा पूर्वक व्रत कथा का पाठ करते हैं और विधिवत ठाकुर जी की पूजा करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

Janmashtami 2025 Vrat Katha

जन्माष्टमी पूजा विधि

- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें और व्रत का पालन करें।
- भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या बाल गोपाल को गंगाजल से स्नान कराएं।
- पीले वस्त्र पहनाएं, माखन-मिश्री और पंचामृत का भोग लगाएं।
- फूलों, तुलसीदल और धूप-दीप से ठाकुर जी की आराधना करें।
- रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समय आरती करें और झूला झुलाएं।
- व्रत कथा का पाठ करें और फिर प्रसाद बांटें।

जन्माष्टमी व्रत कथा हिंदी में

एक समय की बात है, मथुरा नगरी में अत्याचारी राजा कंस का राज्य था। कंस की बहन देवकी का विवाह वासुदेव जी के साथ हुआ। विवाह के बाद आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी। यह सुनकर कंस भयभीत हो गया और देवकी-वासुदेव को कारागार में कैद कर लिया। कंस ने देवकी की सात संतानों को निर्दयतापूर्वक मार डाला। जब आठवीं संतान का जन्म हुआ, उसी समय भगवान विष्णु ने प्रकट होकर वासुदेव से कहा- "वासुदेव! यह मेरा कृष्णावतार है। तुम मुझे गोकुल ले जाकर नंद-यशोदा के घर छोड़ आओ और वहां की कन्या को लाकर कारागार में रख दो।"

वासुदेव जी ने आकाशीय संकेत के अनुसार शिशु कृष्ण को गोकुल पहुंचाया। अद्भुत चमत्कार से कारागार के सभी पहरेदार सो गए और यमुना जी ने मार्ग दिया। गोकुल में जाकर वासुदेव जी ने कृष्ण को नंद-यशोदा को सौंपा और वहां की कन्या लेकर कारागार लौट आए। प्रातः जब कंस ने कन्या को मारना चाहा, तो वह देवी योगमाया के रूप में आकाश में प्रकट होकर बोलीं
"अरे मूर्ख! तुझे मारने वाला तो पहले ही गोकुल में जन्म ले चुका है।" यह सुनकर कंस भय से काँप उठा। यही बालक आगे चलकर महाभारत में अर्जुन के सारथी बने और अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की।

Story first published: Saturday, August 16, 2025, 11:22 [IST]
Desktop Bottom Promotion