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जितिया व्रत में पानी पी सकते हैं या नहीं? जानें सही नियम और पारण का समय
Can We Drink Water In Jitiya Vrat: हिंदू धर्म में जितिया व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए रखती हैं। इसे अष्टमी तिथि पर रखा जाता है और इसका पालन खासकर उत्तर भारत और नेपाल, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में बड़े श्रद्धा भाव से किया जाता है। जितिया व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है क्योंकि इसमें उपवास रखने वाली महिलाएं अन्न तो दूर, पानी तक ग्रहण नहीं करतीं।
यही वजह है कि अक्सर महिलाओं के मन में सवाल आता है कि क्या इस व्रत के दौरान पानी पी सकते हैं या नहीं। धार्मिक शास्त्रों में इस बारे में स्पष्ट नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना आवश्यक माना गया है। आइए जानते हैं जितिया व्रत के नियम, इसका महत्व और इसमें पानी पीने को लेकर क्या कहा गया है।

जितिया व्रत में पानी पी सकते हैं या नहीं?
जितिया व्रत या जीवित्पुत्रिका व्रत हिन्दू धर्म का एक अत्यंत कठोर और महत्वपूर्ण उपवास है, जिसे मुख्य रूप से माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए करती हैं। यह व्रत खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। पौराणिक नियमों के अनुसार, जितिया व्रत पूर्णतः निर्जला उपवास है। यानी इस दिन पानी भी नहीं पिया जाता। यही कारण है कि इसे सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि इस कठोर तपस्या और संयम से भगवान जीमूतवाहन प्रसन्न होते हैं और पुत्र को दीर्घायु तथा परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
कब पी सकते हैं पानी
जितिया व्रत में सूर्योदय से पहले पानी पी सकते हैं और नहाय-खाय यानी एक दिन पहले आप खाना खा सकते हैं। लेकिन जिस दिन व्रत होता है उस दिन न तो खाना खा सकते हैं और न ही पानी पी सकते हैं। व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है तो उस दिन भगवान सूर्य को जल चढ़ा और पूजा करने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है और पानी व अन्न ग्रहण किया जाता है। मगर जो महिलाएं बीमार हों, गर्भवती उनके लिए छूट होती है कि वो पानी पी सकती हैं।
जितिया व्रत के नियम
- व्रत से एक दिन पहले (अष्टमी) व्रती महिलाएं निर्जला उपवास की तैयारी करती हैं और सिर्फ फलाहार करती हैं।
- नवमी तिथि को सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक अन्न और जल का त्याग किया जाता है।
- इस दौरान महिलाएं कथा सुनती और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।
- दशमी तिथि की सुबह व्रत का पारण किया जाता है और तब जाकर व्रती जल और अन्न ग्रहण करती हैं।



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