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Janmashtami 2023 Kheere Ki Puja: क्या है नाल छेदन जिसके बिना अधूरा है जन्माष्टमी की पूजा?
Janmashtami 2023 Kheere Ki Puja: विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण का जन्म भादों माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था तब से भगवान् श्री कृष्ण का जन्म जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।
इस दिन जो सामान्य व्रत और पूजा होती है वो तो हैं ही लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कृष्ण के लड्डू गोपाल की छोटी सी मूर्ति खीरे के अन्दर क्यों रखी जाती है? आधी रात को खीरे में से श्रीकृष्ण को निकालने के बाद ही जन्माष्टमी की पूजा क्यों होती है? आइये इस बारे में हम आपको बताते हैं।

जन्माष्टमी पूजा में क्यों रखा जाता है खीरा?
लड्डू गोपाल की मूर्ति खीरे के अन्दर दिन भर रखी जाती है और आधी रात को खीरे में से निकाली जाती है जो प्रतीकात्मक रूप से कृष्ण के जन्म के रूप में देखा जाता है। इस धार्मिक प्रक्रिया को नाल छेदन कहते हैं और ऐसा कहा जाता है की नाल छेदन के बिना जन्माष्टमी की पूजा अधूरी होती है।
भगवान् श्री कृष्ण को खीरा बहुत पसंद है और इसलिए उनके लिए 56 भोग में खीरे से बनाए व्यंजन जरुर शामिल किया जाता है। नाल छेदन के अंतर्गत खीरा गर्भाशय का प्रतीक है। भगवान् श्री कृष्ण का जन्म आधी रात को कारागार में हुआ था। उनके जन्म को प्रतीकात्मक रूप से मानाने के लिए डंठल वाले खीरे का उपयोग किया जाता है।
खीरा के अन्दर या खीरा के पास में लड्दुगोपाल की मूर्ति को दिन भर रखते हैं और आधी रात को चांदी के सिक्के से खीरे को काटकर लड्डू गोपाल को बाहर निकालते हैं या सिर्फ डंठल को काट कर अलग कर देते हैं। जैसे एक बच्चा माँ के गर्भाशय से निकलता है उसके बाद गर्भनाल को काटा जाता है, वैसे ही डंठल को भी गर्भनाल की तरह काटा जाता है। इसके बाद शंख और घंटी बजाकर भगवान् कृष्ण का स्वागत करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस खीरे को किसी गर्भ धारण करने वाली महिला को खिलाया जाए तो उसे कृष्ण जैसी संतान प्राप्ति होती है।
यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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