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कौन हैं भगवान राम की सखियां, जो पुरुष होकर धरते हैं महिला का रुप, त्रिजटा स्नान कर कुंभ से लेती हैं विदा
हर कुंभ में भगवान राम की सखियां आती हैं और इसे अपने नैहर के रूप में मानती हैं। वे सजी-धजी होती हैं और कुंभ के चार शाही स्नान में हिस्सा लेती हैं। हालांकि, उनकी एक विशेषता है जो सबको हैरान करती है। ये सखियां पुरुष होते हुए भी स्त्री की वेषभूषा में सज-धज कर आती हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि ये पुरुष स्त्रियों के रूप में क्यों आती हैं।
इनकी यात्रा के बाद, त्रिजटा स्नान के बाद, भगवान राम की सखियां कुंभ से विदा ले लेती हैं। जाते समय, वे अपनी साड़ी की गांठ में गंगा की रेती बांध लेती हैं और फिर अर्धकुंभ में वापसी करती हैं।

त्रिजटा स्नान क्या है?
त्रिजटा स्नान का महत्व उन श्रद्धालुओं के लिए है जो माघ पूर्णिमा के बाद भी संगम में स्नान करते हैं। 'त्रिजटा' का अर्थ है तीन धाराएं - गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती। इस स्नान को कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम माना जाता है, और मान्यता है कि इससे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है, साथ ही पूरे माघ मास के स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।
असल में राम की सखियां कौन थीं?
राम की सखियां वे महिलाएं थीं, जो राम के साथ उनकी जीवन यात्रा में शामिल थीं। इनमें सीता, लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला, और सीता की बहन शृंगि शामिल थीं। इसके अलावा, वे महिलाएं भी थीं जिनका जीवन राम और उनके परिवार से जुड़ा था। मान्यता है कि सीता के साथ जमीन से उत्पन्न आठ स्त्रियां भी सखी मानी जाती हैं, जिनमें चारशिला, चंद्रकला, रूपकला, हनुमाना, लक्षमाना, सुलोचना, पदगंधा और बटोहा शामिल हैं। ये सभी सीता की बहनें मानी जाती हैं।
कुंभ में आने वाली राम की सखियां कौन होती हैं
कुंभ में आने वाली राम की सखियां शारीरिक रूप से पुरुष होती हैं, लेकिन वे राम की उपासना सखी भाव से करती हैं। इस कारण वे स्त्रियों की तरह सज-धज कर आती हैं, हाथों में रंग-बिरंगी चूड़ियां, आंखों में काजल और पांव में आलता लगाती हैं। वे राम को दुल्हा और खुद को उनकी सखी मानती हैं। राम से उनका रिश्ता जीजा-साली जैसा होता है, और वे भजनों में भी राम से छेड़छाड़ के प्रसंग गाती हैं। कुंभ उनके लिए नैहर की तरह होता है, जहां वे महीनों तक नाच-गाकर राम को रिझाती हैं। त्रिजटा स्नान के बाद वे विदा ले लेती हैं, और जाते समय गंगा से आशीर्वाद लेकर राम के भजन गाती हैं।
सखी संप्रदाय क्या है?
सखी संप्रदाय एक विशेष भक्ति परंपरा है, जो मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति से जुड़ी है। इस संप्रदाय में पुरुष ही शामिल होते हैं। इसके अलावा, राम से जुड़ा सखी संप्रदाय भी होता है। सखी संप्रदाय में दीक्षित होने के बाद व्यक्ति को जीवनभर भक्ति में रम जाना होता है, और घर-बार त्यागना पड़ता है। यह रामनंदी और कृष्णानंदी दोनों रूपों में होता है।
अनी अखाड़ा से जुड़ी होती हैं ये सखियां
अनी अखाड़ा (Ani Akhada) एक धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन है, जो मुख्य रूप से हिंदू धर्म, शैव और नथ परंपराओं से जुड़ा होता है। यह भारतीय समाज में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा होता है। अनी अखाड़ा में विशेष रूप से राम की सखियां जुड़ी होती हैं, जो राम की उपासना करती हैं।
रामनंदी और कृष्णानंदी सखियों में अंतर?
रामनंदी और कृष्णानंदी सखियों का पहचानने का तरीका उनके माथे पर लगाए गए तिलक से होता है। रामनंदी सखियां माथे पर लाल तिलक लगाती हैं, जो उनके राम के प्रति भक्ति और उपासना को दर्शाता है। वहीं कृष्णानंदी शाखा की सखियां माथे पर राधा नाम की बिंदी लगाती हैं, जो उनकी श्री कृष्ण के प्रति भक्ति को प्रतीकित करती है। यह तिलक और बिंदी उनके संप्रदाय की पहचान होती है।
रामनंदी सखी संप्रदाय में भगवान राम को भक्ति का केंद्र माना जाता है, जहां भक्त उन्हें प्रिय मित्र या सखा के रूप में देखेते हैं। यह संबंध गहरे आत्मीय प्रेम से जुड़ा होता है। वहीं कृष्णनंदी संप्रदाय में भक्त भगवान कृष्ण को प्रेमी, मित्र, या प्रियतम के रूप में मानते हैं और रासलीला तथा प्रेम के रस में डूबते हैं। रामनंदी सखी संप्रदाय उत्तर भारत और गुजरात में प्रचलित है, जबकि कृष्णानंदी संप्रदाय विशेष रूप से वृंदावन, मथुरा और गोप्य भक्ति से जुड़ा हुआ है।



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