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Mahashivratri Vrat Katha: महाशिवरात्रि के दिन जरूर पढ़ें शिवपुराण की यह व्रत कथा, मिलेगा पूजा का संपूर्ण फल
Mahashivratri Vrat Katha In Hindi: हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि का त्यौहार हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 15 फरवरी, रविवार को मनाया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इसके अलावा, कई लोग महादेव को प्रसन्न करने के लिए उपवास भी रखते हैं। यदि आप इस दिन व्रत कर रहे हैं, तो आपको महाशिवरात्रि की व्रत कथा जरूर पढ़नी चाहिए। शिव पुराण में भी इस व्रत की महिमा बताई गई है। आइए, जानते हैं महाशिवरात्रि व्रत की कथा -

महाशिवरात्रि व्रत कथा
शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। वह जंगल में शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। जीवन यापन के लिए उसने एक साहूकार से ऋण लिया था, लेकिन समय पर उसे चुका नहीं पाया। क्रोधित साहूकार ने उसे पकड़कर शिव मठ में बंदी बना दिया। संयोग से जिस दिन उसे बंदी बनाया गया, वह महाशिवरात्रि का पावन दिन था। मठ में रहते हुए उसने चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि व्रत की महिमा सुनी। सायंकाल साहूकार ने उसे बुलाकर ऋण चुकाने की बात कही और कुछ समय के लिए छोड़ दिया। उसके बाद वह फिर शिकार की खोज में निकला। बंदीगृह में रहने के कारण वह बहुत भूखा था। शिकार की तलाश में वह बहुत दूर निकल आया। रात होने पर उसने एक पेड़ पर चढ़कर विश्राम करने का निश्चय किया और एक पेड़ पर चढ़ गया।
उस पेड़ के नीचे शिवलिंग था जो बेलपत्र के पत्तों से ढका हुआ था। शिकारी को उसके बारे में जानकारी नहीं थी। पेड़ पर चढ़ते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे अनजाने में शिवलिंग पर गिरती रहीं। इस प्रकार बिना जाने ही उसने बेलपत्र अर्पित कर दिए और शिवरात्रि का उपवास भी कर लिया। रात के समय एक हिरणी पानी पीने तालाब पर आई। शिकारी जैसे ही उसका शिकार करने जा रहा था भी हिरणी बोली मैं गर्भवती हूं मैं शीघ्र ही प्रसव करने वाली हूं। यदि तुम मुझे अभी मारोगे तो दो जीवन नष्ट हो जाएंगे। मुझे बच्चे को जन्म देने दो, मैं वचन देती हूं कि वापस आ जाऊंगी। शिकारी ने हिरणी को जाने दिया। इस दौरान फिर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े और प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न हो गई।
इस दौरान वहां एक हिरणी अपने बच्चों के साथ आई। जब शिकारी उसे मारने लगा, तो उसने निवेदन किया कि वह अभी-अभी ऋतु से निवृत्त हुई है और अपने पति की खोज में है। उसने भी लौटने का वचन दिया। शिकारी ने उसे भी जीवनदान दे दिया। अनजाने में दूसरे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई। रात के अंतिम पहर एक हिरणी अपने बच्चों सहित वहां पहुंची। उसने भी प्रार्थना की और शिकारी ने उसे जाने दिया। थोड़ी देर में एक हिरण भी आया। इस बार शिकारी ने निश्चय किया कि अब वह शिकार अवश्य करेगा। किंतु हिरण ने विनम्रता से कहा- "यदि मैं मारा गया तो मेरी पत्नियां अपने वचन का पालन नहीं कर पाएंगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वास देकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी कुछ समय दो। हम सब साथ लौट आएंगे।" शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
उसने भी शिकारी से निवेदन किया और शिकारी ने उसे जाने दिया। इसके बाद शिकारी के सामने एक हिरण आया। शिकारी ने सोचा अब तो मैं इसे यहां ने नहीं जाने दूंगी इसका शिकार करुंगी। तब हिरण ने उससे निवेदन किया कि मुझे कुछ समय के लिए जीवनदान दे दो। शिकारी ने पूरा रात की घटना उस हिरण को सुना दी। तब हिरण ने कहा कि जिस तरह से तीनों पत्नियां प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वापात्र मानकर छोड़ा है मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।
इस तरह सुबह हो गई। उपवास, रात्रि जागरण, और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से अनजान में ही शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। थोड़ी देर बाद हिरण अपने परिवार सहित लौट आया। उनकी सत्यनिष्ठा देखकर शिकारी के हृदय में करुणा जागी और उसने सबको जीवनदान दे दिया। भगवान शिव उसकी इस करुणा और अनजाने में किए गए व्रत से प्रसन्न हुए। अनजाने में शिवरात्रि व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। मृत्यु के समय जब यमदूत उसे लेने आए, तब शिवगणों ने उन्हें रोक दिया और शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से चित्रभानु को अपने पूर्व जन्म की स्मृति भी प्राप्त हुई और अगले जन्म में भी उसने श्रद्धा से शिवरात्रि व्रत का पालन किया।



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