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Margshirsh Purnima Vrat Katha: आज मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, होगी हर मनोकामना पूरी
Margshirsh Purnima Vrat Katha: हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसे अगहन पूर्णिमा, बत्तीसी पूर्णिमा या बत्तीसी पूनम के नाम से भी जाना जाता है। गीता में स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है कि 'मासों में मैं मार्गशीर्ष स्वयं हूं।' मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन भगवान श्री कृष्ण और भगवान विष्णु की विशेष तौर पर पूजा की जाती है। इसके अलावा, मार्गशीर्ष पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा करने का भी विधान है। चंद्र देव की उपासना भी करनी चाहिए। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन व्रत रखने, स्नान-दान करने और सत्यनारायण पूजा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा भी रहती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। पूर्णिमा के लिए पूजा करने के बाद व्रत कथा पढ़ना बेहद पुण्यदायी माना जाता है। ऐसे में, आइए पढ़ते हैं पूर्णिमा व्रत कथा -

मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत कथा
कहा जाता है कि काशीपुर में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण रहता था। एक दिन जब वह भिक्षा मांग रहा था, तब भगवान विष्णु स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए। उन्होंने उससे कहा, "हे विप्र! श्री सत्यनारायण भगवान सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाले हैं। तुम उनका व्रत और पूजन करो। इस व्रत से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।" भगवान ने यह भी बताया कि उपवास का अर्थ केवल भोजन न करना नहीं है, बल्कि मन और शरीर की शुद्धता बनाए रखना, भगवान को अपने समीप अनुभव करना, और श्रद्धा-भक्ति से पूजन करना ही सच्चा उपवास है।
सत्यनारायण व्रत की कथा बताती है कि इस व्रत को करने का अधिकार हर मनुष्य को है, चाहे वो गरीब हो या अमीर, व्यापारी हो या राजा, ब्राह्मण हो या कोई अन्य। इसीलिए कथा में कई पात्रों की घटनाएं जुड़ी हैं, जैसे गरीब ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा उल्कामुख, साधु वैश्य, उसकी पत्नी लीलावती, पुत्री कलावती, राजा तुंगध्वज और गोपगण। इस कथा के अनुसार जैसे ही इन सभी ने सत्यनारायण व्रत के महत्व को सुना, वे तुरंत श्रद्धा और विश्वास से व्रत-पूजन में लग गए। परिणामस्वरूप उन्हें जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति हुई।
एक साधु वैश्य ने भी यही प्रसंग राजा उल्कामुख से सुना, लेकिन उसका विश्वास अधूरा था। उसने मन ही मन सोचा कि जब मुझे संतान प्राप्त होगी, तब मैं यह व्रत करूंगा। समय बीतने पर उसके घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ। पत्नी ने उसे व्रत की याद दिलाई, लेकिन उसने कहा, "कन्या के विवाह के समय व्रत करेंगे।"
समय आया, कन्या का विवाह भी हो गया, परंतु उसने फिर भी व्रत नहीं किया। एक दिन वह अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए यात्रा पर गया, जहां चोरी के झूठे आरोप में दोनों को राजा चंद्रकेतु ने कारागार में डाल दिया। उसी दौरान उसके घर भी चोरी हो गई। पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती को भिक्षा मांगकर गुजारा करना पड़ा।
एक दिन कलावती ने किसी घर में सत्यनारायण व्रत होते देखा। उसने वहाँ से प्राप्त प्रसाद अपनी माँ को लाकर दिया। इस प्रसंग ने लीलावती के हृदय को हिला दिया। अगले दिन उसने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से व्रत-पूजन किया और भगवान से पति व दामाद की शीघ्र वापसी का आशीर्वाद माँगा।
भगवान प्रसन्न हुए। उसी रात्रि राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश मिला कि "ये दोनों निर्दोष हैं, उन्हें तुरंत मुक्त कर दो।" अगली सुबह राजा ने उन्हें मुक्त कर सम्मान सहित धन सहित विदा किया। घर पहुंचकर वैश्य ने जीवनभर पूर्णिमा और संक्रांति के दिन सत्यनारायण व्रत किया और अंत में समस्त सांसारिक सुखों का आनंद लेकर मोक्ष को प्राप्त हुआ।



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