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Muharram Ka Chand Kab Dikhega : कब दिखेगा मुहर्रम का चांद, जानें इस पाक महीने की अहमियत
Muharram 2025 Moon Sighting in India : मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) का पहला महीना होता है। यही कारण है कि इस महीने से इस्लामी नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। यह महीना सिर्फ नए साल का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह इस्लाम के चार सबसे पवित्र महीनों में से एक है। इसमें युद्ध करना वर्जित माना गया है और इस माह को बेहद आदर और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

2025 में मुहर्रम कब शुरू होगा?
मुहर्रम की तारीख हर साल चांद दिखने पर तय होती है क्योंकि इस्लामिक कैलेंडर चंद्र आधारित होता है। 2025 में मुहर्रम का चांद 27 जून 2025 (शुक्रवार) की शाम को दिख सकता है। अगर उस दिन चांद नजर आता है, तो मुहर्रम की पहली तारीख 28 जून को मानी जाएगी। हालांकि, अंतिम निर्णय चांद के दीदार पर ही निर्भर करेगा।
मुहर्रम और करबला की घटना
मुहर्रम का महीना इसलिए भी अहम माना जाता है क्योंकि इसी महीने की 10 तारीख को इतिहास की बेहद दुखद घटना 'कर्बला की जंग' हुई थी। इस युद्ध में इस्लाम के पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन (रजि.) को उनके परिवार और साथियों के साथ शहीद कर दिया गया था। यह घटना 680 ईस्वी में आधुनिक इराक के कर्बला नामक स्थान पर हुई थी।
9वीं और 10वीं तारीख की अहमियत
मुहर्रम के महीने की 9वीं और 10वीं तारीख का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है। इन दो दिनों को मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से याद करता है।
9 मुहर्रम: इस दिन इमाम हुसैन और उनके साथियों ने कर्बला के मैदान में अंतिम रात बिताई थी।
10 मुहर्रम (यौम-ए-आशूरा): इस दिन उन्हें शहीद कर दिया गया।
सुन्नी और शिया समुदाय की आस्थाएं
इस्लाम में सुन्नी और शिया दो प्रमुख समुदाय हैं, और दोनों मुहर्रम को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन उनके भाव और परंपराएं अलग होती हैं।
सुन्नी मुस्लिम: उनका मानना है कि इसी दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी कौम को फिरौन से बचाया था और समुद्र को दो हिस्सों में बांट दिया था। सुन्नी मुस्लिम इस दिन रोजा रखते हैं और अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं।
शिया मुस्लिम: वे इस दिन को इमाम हुसैन की शहादत के दिन के रूप में याद करते हैं और मातम मनाते हैं। वे जलूस निकालते हैं, कर्बला की घटना को दोहराते हुए इमाम की कुर्बानी को श्रद्धांजलि देते हैं।
मुहर्रम का संदेश
मुहर्रम केवल शोक या मातम का महीना नहीं है, बल्कि यह सत्य, न्याय और बलिदान की मिसाल पेश करता है। इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर जो बलिदान दिया, वह आज भी इंसानियत और धार्मिकता का प्रतीक माना जाता है।



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