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Ramadan Ke Pehle Ashre Ki Dua: रोजा रखने के साथ पढ़ें पहले अशरे की ये दुआ, मिलेगा सवाब, पूरी होगी हर मन्नत
Ramadan Ke Pehle Ashre Ki Dua: 18 फरवरी को चांद रात के बाद 19 फरवरी से रमजान के पाक महीने की शुरुआत हो गई है। इबादतों का गुलदस्ता और गुनाहों से तौबा का महीना 'रमजान-उल-मुबारक' हम पर अपनी छाया करने को है। यह वह मुकद्दस महीना है जिसे अल्लाह तआला ने तीन रूहानी पड़ावों में विभाजित किया है, जिन्हें हम 'अशरा' के नाम से जानते हैं। रमजान की पहली किरण से लेकर 10वीं तारीख तक का सफर 'पहला अशरा' कहलाता है, जो पूरी तरह अल्लाह की 'रहमत' (Mercy) को समर्पित है।
इन शुरुआती 10 दिनों में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और खुदा की रहमत हर उस बंदे को अपनी पनाह में ले लेती है जो सच्चे दिल से सजदे में सिर झुकाता है। जब एक रोजेदार अपनी इच्छाओं का त्याग कर केवल रब की रजा के लिए दिन गुजारता है, तो उसके जीवन में बरकत और तकदीर बदलने वाले लम्हें दस्तक देते हैं। आइए, इस लेख के जरिए उस शक्तिशाली दुआ को दिल में उतारते हैं, जो पहले अशरे में हमारी इबादत का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।

क्या है इन पहले 10 दिनों की रूहानी अहमियत?
इस्लामिक नजरिए से रमजान का पहला हिस्सा अल्लाह की बेपनाह दया और करुणा का होता है। जानें क्यों इन 10 दिनों में मांगी गई हर छोटी-बड़ी दुआ सीधे अर्श तक पहुंचती है। ऐसा माना जाता कि ये दिन हर मुसलमान के लिए बहुत पाक होते हैं और इस्लाम में इनका बहुत महत्व होता है।
यहां पढ़ें पहले अशरे की दुआ, अरबी और हिंदी अर्थ के साथ
पहले अशरे की दुआ केवल कुछ शब्द नहीं, बल्कि खुदा से माफी और दया की पुकार है।
अरबी: رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ
हिंदी: "रब्बिग़फ़िर वरहम व अन्ता खैरुर्-राहिमीन"
अर्थ: "ऐ मेरे रब! मुझे बख्श दे और मुझ पर रहम फरमा, तू सबसे बेहतर रहम करने वाला है।"
रहमत की दुआ पढ़ने का सही तरीका और कसरत
इस दुआ को पढ़ने के लिए कोई विशेष समय तय नहीं है, लेकिन नमाज के बाद, सहरी करते वक्त और इफ्तार से चंद मिनट पहले इसे बार-बार पढ़ना या जिक्र करना सुन्नत और सवाब का काम है। हर मुसलमान के लिए ये दुआ बहुत ही खास होती है।
सिर्फ रोजा ही नहीं, इन 5 नेक कामों से पाएं अल्लाह की विशेष कृपा
इबादत को मुकम्मल बनाने के लिए रोजे के साथ-साथ कुरान की तिलावत, कसरत से सदका (दान), जुबान की पाकीजगी और रातों में तहज्जुद की नमाज अदा करना, पहले अशरे की रूहानियत को बढ़ा देता है। हर मुसलमान को रमजान के दौरान ये 5 काम करने का हुकुम होता है।
सहरी और इफ्तार: दुआओं की कुबूलियत के सुनहरे लम्हें
हदीस के मुताबिक, सहरी और इफ्तार के वक्त की दुआ कभी खाली नहीं जाती। इस दौरान 'रहमत की दुआ' का निरंतर पाठ आपकी जिंदगी में खुशहाली और रूहानी सुकून का जरिया बनता है। पहले अशरे में कुरान का नजूल (अवतरण) की याद ताजा करें। जानें क्यों इन 10 दिनों में कुरान पढ़ना और जिक्र-ए-इलाही करना आपकी मानसिक शांति के लिए रामबाण है।



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