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Rath yatra 2025: मिट्टी की 752 हांडी और लकड़ी की रसोई में तैयार होता है महाप्रसाद, जानें धार्मिक मान्यता
Rath yatra 2025: पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा भव्यता और श्रद्धा का प्रतीक है। 27 जून 2025, को पुरी में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाएगी। इस यात्रा में देश-विदेश से लोग शामिल होने के लिए आते हैं। कहा जाता है कि जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा में शामिल होने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
रथ यात्रा से जुड़ी कई अनूठी परंपराएं भी हैं जो इसे विशेष बनाती हैं। इन्हीं में से एक है भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद की परंपरा, जिसे बनाने से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया दिव्यता और नियमों से परिपूर्ण होती है। आइए जानते हैं महाप्रसाद से जुड़ी खास बातों के बारे में विस्तार से।
क्या होता है जगन्नाथ महाप्रसाद?
जगन्नाथ मंदिर में बनने वाला महाप्रसाद भारत के सबसे पवित्र प्रसादों में गिना जाता है। इसे 'अभद्र भोग' नहीं बल्कि 'महाप्रसाद' कहा जाता है क्योंकि यह भगवान को अर्पण किए जाने के बाद पूरे श्रद्धाभाव से भक्तों में वितरित किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से चावल, दाल, सब्जी, खीर, खिचड़ी, पित्तल आदि शामिल होते हैं।

कैसे बनता है महाप्रसाद?
पुरी के श्रीमंदिर परिसर में स्थित 'रोजघर' (भोजनशाला) दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोई है। यहां मिट्टी के 752 हांडी में लकड़ी की आग पर खाना पकाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बेहद शुद्धता और पारंपरिक विधि से की जाती है। खाना 3 स्तरों में रखा जाता है और ऊपरी हांडी में पहले भोजन पकता है, जो एक चमत्कारी बात मानी जाती है।

कौन बनाता है प्रसाद और कब बनता है भोग?
महाप्रसाद केवल सुवर्ण वर्ग के सदस्य ही बनाते हैं, जिनका यह पारंपरिक कार्य होता है। इनके परिवार पीढ़ियों से भगवान के भोग के लिए प्रसाद बनाते आ रहे हैं। इन रसोइयों को धार्मिक नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है। बता दें कि रोजाना 6 बार भोग लगाया जाता है और रथयात्रा जैसे विशेष अवसर पर यह व्यवस्था कई गुना बढ़ा दी जाती है। रथयात्रा के दौरान भक्तों की संख्या लाखों में पहुंचती है, ऐसे में महाप्रसाद भी उसी स्तर पर तैयार किया जाता है।
क्यों कहा जाता है इसे 'महाप्रसाद'?
भगवान को अर्पण के बाद जब प्रसाद भक्तों के बीच वितरित होता है, तब उसे 'महाप्रसाद' कहा जाता है। यह न केवल भोजन बल्कि भक्ति, आस्था और पुण्य का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसे खाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रसाद को आनंद बाजार नामक क्षेत्र में भक्तों को वितरित किया जाता है। यहां कोई जात-पात का भेद नहीं होता। सभी भक्त एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते हैं, जो सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण है।



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