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Kanwar Yatra: कौन था सबसे पहला कांवड़ियां? इस प्रचलित कथा से जानें कैसे हुई कांवड़ यात्रा की शुरुआत
सावन का महीना आते ही शिव भक्तों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता है। इस माह में कांवड़ यात्रा का भी शुभारंभ हो जाता है। भक्त कांवड़ लेकर किसी पवित्र धाम की यात्रा करते हैं और वहां से लाये गंगाजल से भोलेबाबा का अभिषेक करते हैं।
कांवड़ यात्रा पर जाने वाले भक्त इस दौरान नंगे पैर कई किलोमीटर की यात्रा तय करते हैं। इसके साथ ही कई कठिन नियमों का पालन भी किया जाता है। हर कांवड़िये का एक ही मकसद होता है कि वो महादेव को जल चढ़ा सके।

लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि कांवड़ का इतिहास आखिर कितना पुराना है, किसने कांवड़ यात्रा की शुरुआत की और कौन था वह पहला शख्स जो कांवड़ यात्रा पर गया था। आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि इतिहास में सबसे पहला कांवड़ियां कौन था और उसने यह कठिन यात्रा क्यों की थी।
जब ऋषि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु का किया शानदार आदर सत्कार
प्रचलित कथा की मानें तो एक बार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचे थे। ऋषि जमदग्नि ने उनकी सेवा-सत्कार में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी। वहीं एक ऋषि द्वारा इतना आदर-सत्कार पाकर सहस्रबाहु बहुत प्रसन्न हुआ। मगर उसके मन में यह बात घूमती रही कि आखिर सामान्य से दिखने वाले ऋषि ने उसके और उसकी सेना के लिए इतना बढ़िया इंतजाम आखिर कैसे किये और कैसे वह इतने सारे भोजन का बंदोबस्त कर पाया।
सहस्रबाहु को पता चल गया कारण
सहस्रबाहु तब तक बेचैन रहा जब तक उसे इस बात की जानकारी नहीं गयी। आखिरकार उसके सैनिकों ने राज से पर्दा उठाया और बताया कि ऋषि जमदग्नि के पास एक कामधेनु नाम की दिव्य गाय है। यह एक चमत्कारी गाय है जिससे जो कुछ भी मांगो वह मिल जाता है। ऋषि जमदग्नि इसी गाय की मदद से राजा और उसके सैनिकों को भोजन करा पाए थे। राजा को जैसे ही इस गाय के बारे में पता चला, उसके मन में लालच पैदा हो गया। वह उस गाय को पाना चाहता था। सहस्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि से वह गाय मांगी लेकिन ऋषि ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इस बात से सहस्रबाहु क्रोधित हो उठा और उसने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया।

ऋषि जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने लिया बदला
जब परशुराम को अपने पिता की मृत्यु की जानकारी मिली तो वह बहुत क्रोधित हुए। जैसे ही उन्हें पता चला कि कामधेनु गाय के लिए सहस्रबाहु ने उनके पिता ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी तो इसका बदला परशुराम ने लिया। उन्होंने सहस्त्रबाहु की सभी भुजाओं को काटकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद परशुराम कठोर तपस्या करने लगे और उसके फलस्वरूप उनके पिता जमदग्नि को फिर से जीवनदान मिला। पुनःजीवित होने पर जब पिता जमदग्नि को पता चला कि परशुराम ने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया है तो उन्होंने प्रायश्चित करने के लिए पुत्र परशुराम को भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए कहा।

परशुराम थे पहले कांवड़ यात्री
अपने पिता की आज्ञा का पालन करने हेतु भगवान परशुराम नंगे पैर कई मील का सफर तय करके गंगा जल लेकर आए। उसके बाद उन्होंने आश्रम के पास ही शिवलिंग की स्थापना की और फिर भगवान भोलेनाथ महाभिषेक किया। उनकी आराधना कर पश्चाताप किया।
पहले कांवड़िये के रूप में रावण का नाम भी है शामिल

अन्य प्रचलित मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण को भी पहला कांवड़िया माना जाता है। कांवड़ यात्रा की इस परंपरा का संबंध समुद्र मंथन से माना गया है। देवों और दैत्यों ने मिलकर जब क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया था तब उसमें से विष निकला था। सृष्टि को इस जहर से बचाने के लिए भगवान भोलेनाथ ने इसे अपने गले में रख लिया। इस विष से निकलने वाले नकारात्मक प्रभाव और ताप को कम करने के लिए रावण ने ही सबसे पहले गंगाजल से शिवजी का अभिषेक किया था।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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