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Shanivar Vrat Udyapan: शनि व्रत का उद्यापन करते हुए न करें गलती, ये है विधि और इन चीजों का करें दान
Shanivar Vrat Udyapan Vidhi : शनिदेव को ग्रहों का राजा माना जाता है। शनि देव को बहुत जल्दी क्रोध आता है। जातक के कुंडली में साढेसाती और ढैया का योग बनने पर शनिदेव जातक को कष्ट देते है। अपने क्रोधी स्वभाव के कारण पिता सूर्य से इनकी नाराजगी बनी रहती है।
इनके क्रोध से बचने के लिए लोग इन्हें शांत करने के लिए कई उपाय करते हैं। इसलिए इन्हें प्रसन्न करने के लिए जातक शनिवार व्रत रखते हैं।
शनिवार का व्रत अत्यधिक लाभकारी माना जाता है। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाने वाला यह व्रत शनि की कृपा प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है और कुंडली में कमजोर शनि के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

ये है उद्यापन विधि
शनिदेव उद्यापन विधिपूर्वक 17, 27, 37, 57 अथवा जितने भी व्रत करने का आपने संकल्प किया था उतने शनिवार के व्रत के बाद आखिरी शनिवार को करना चाहिए। व्रत का संकल्प पूरा होने के बाद उससे अगले शनिवार को सुबह उठ कर नित्य कर्मो से निवृत हो कर स्नान के जल में गंगा जल व काले तिल डालकर स्नान करें साथ में "ॐ प्राम प्रीम प्रौम सः शनैश्चराय नमः " का जाप करें।
ॐ शं शनैश्चराय नम : यह शनि देव का विशिष्ट मन्त्र है पूजन के बाद इसकी एक माला तो जपनी ही चाहिए।
शनिवार व्रत की पूजा कैसे करें
-शनिवार का व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। प्रात:काल के समय वह अपना नित्यकर्म पूर्ण करके घर में गंगा जल या अन्य कोई पवित्र जल छिड़क कर घर की शुद्धि करें।
-स्नान के बाद नीले या काले वस्त्र धारण कर शनिदेव की पूजा करें।
-शनि चालीसा, स्तोत्र, मंत्र और आरती से भगवान की पूजा करनी चाहिए। शनि व्रत कथा (उपवास कथा) का पाठ करना चाहिए।
- व्यक्ति को सुबह और शाम शनि मंदिर जा कर शनि देव के दर्शन करने चाहिए।
- शनि देव के मंदिर में तिल का तेल, काली उड़द की दाल, काली वस्तुएं, काला तिल और तेल से बने भोजन का प्रसाद चढ़ाएं।
- पूजा कथा का सुनने के साथ ही सूर्यास्त के 2 घंटे बाद ही भोजन करना चाहिए।
- भोजन में उड़द की दाल से बनी खाद्य सामग्री को प गरीब दान करने के बाद खाना चाहिए।
- गरीब व्यक्ति की क्षमता के अनुसार दान करें। दान में काला कंबल, छाता, तिल, जूते आदि शामिल हो सकते हैं।
- शनि ग्रह के मंत्र का जाप करें।
शनिवार व्रत कथा एवं सामग्री
एक बार नौ ग्रहों में बहस छिड़ी की सभी ग्रहों में सब से श्रेष्ठ कौन है। इस बात काफैसला करने सभी इंद्र देव के पास गए। इंद्र देव ने ग्रहों के क्रोध के भय से उन सभी को राजा विक्रमादित्य के पास भेज दिया। राजा विक्रमादित्य ने इस बात का फैसला करने के लिए 9 सिंघासन क्रमश: स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के बनवाए और सभी को अपनी महता के अनुसार एक के पीछे एक लगवाया। इस प्रकार 9 सिंघासनों में प्रथम स्वर्ण का व अंतिम लोहे का सिंघासन रखा गया। राजा विक्रमादित्य ने कहा की सभी ग्रह अपनी पसंद के अनुरूप अपने सिंघासन पर विराजमान हो जाएँ। सबसे अंतिम, लोहे के सिंघासन पर शनि ग्रह (शनि देव) विराजमान हुए। राजा विक्रमादित्य ने इस प्रकार संकेत दिया की आप लोगों ने खुद ही अपना स्थान चुन कर यह निर्णय कर लिया की श्रेष्ठ कौन है। इस बात से शनि क्रोधित हो उठे और विक्रमादित्य पर अपनी साढ़ेसाती की दशा दाल कर उन्हें परेशान करने लगे।
शनि के प्रकोप से राजा जंगल से जाते समय रास्ता भटक गये, राजा पर चोरी का इल्ज़ाम लगा और सजा के रूप में उनके हाथ पैर काटे गये। राजा कोल्हू का काम करने लगे। एक रात्रि को राजा जब गा रहे थे तो नगर के सेठ की बेटी उनके आवाज़ पर मोहित हो कर उनसे विवाह के लिए हट कर बैठी। उसके माता पिता ने उसे समझाया पर उसने एक ना सुनी और अपने हट में आ कर उसने भोजन त्याग दिया।
अंतत: सेठ ने अपनी पुत्री का विवाह राजा विक्रमादित्य से कर दिया। उस रात्रि शनि देव राजा के स्वपन में आए और कहा की तुमने मेरा अपमान किया था उस कि दंड स्वरूप तुम्हें साढ़े साथ वर्ष तक ये कष्ट झेलने पड़े और तुम्हारे पर चोरी का इल्ज़ाम लगा। इस पर राजा ने शनि देव से माफ़ी माँगी और कहा की आगे किसी को इतना कष्ट ना दें। शनि देव ने कुछ क्षण विचार कर के कहा की जो भी मनुष्य सच्चे मन से मेरी भक्ति करेगा और शनिवार का व्रत करेगा उसे मैं अपने कोप से मुक्त रखूंगा।
अगली सुबह जब राजा विक्रमादित्य जगे तो उनके हाथ पांव ठीक हो चुके थे और वो बिलकुल स्वास्थ थे साथ ही जिस ज़ेवर के चोरी का इल्ज़ाम उन पर लगा था वो भी वापस मिल चुका था। यह सब देख कर सेठ की बेटी चकित थी तब राजा ने उसे अपनी पहचान और पूरी कहानी बतायी।
राजा अपनी रानी के संग उज्जैन लौट गये और नगर वासी साढ़े सात सालों के बाद अपने राजा को देख कर बहुत प्रसन्न हुए।
शनिवार व्रत के लाभ
शनिग्रह मन्द गति से भ्रमण करने वाला ग्रह है, इसे सूर्य की एक परिक्रमा करने में तीस वर्ष लगते हैं। इस प्रकार एक राशि पर इसकी दशा ढाई वर्ष पूर्ण वेग से रहती है जबकि आगे - पीछे की दो राशियां भी इससे प्रभावित रहती हैं। शनि देव के प्रकोप के इस काल में और अन्य समयों पर शनि देव के प्रकोप से बचने हेतु तो यह व्रत और शनि देव के निमित्त विशिष्ट वस्तुओं का दान किया ही जाता है। श्री शनि देव और अपने भक्त के सब कष्ट हरकर उसे हर प्रकार का सुख , वैभव , शक्ति , पुत्र - पौत्रादि प्रदान करते हैं ।



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