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Shattila Ekadashi Vrat Katha: षटतिला एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, वरना नहीं मिलेगा पूजा का पूरा फल
Shattila Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हर माह में दो एकादशी तिथियां आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। ऐसे, सालभर में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं। हिंदू पंचाग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा। सबसे खास बात है कि इसी दिन मकर संक्रांति भी मनाई जाएगी। षटतिला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, षटतिला एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और पापों का नाश होता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है, इसलिए इसे षटतिला एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद व्रत कथा पढ़ना व सुनना अनिवार्य माना गया है। मान्यता है कि व्रत कथा के बिना व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। यहां पढ़ें षटतिला एकादशी की व्रत कथा -

षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Ki Katha)
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, एक समय काशी नगरी में एक बहुत गरीब आदमी रहता था। वह जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचता था और उसी से अपने परिवार का पालन करता था। कई बार ऐसा होता कि लकड़ी नहीं बिकती और उसे बच्चों के साथ भूखा ही सोना पड़ता था। एक दिन वह लकड़ी लेकर शहर जा रहा था। रास्ते में एक सेठ ने उसकी सारी लकड़ियां खरीद लीं। जब वह लकड़ी सेठ के घर पहुंचाने गया, तो वहां कुछ विशेष तैयारी चल रही थी। उसने सेठ से पूछा तो सेठ ने बताया कि वह अगले दिन षटतिला एकादशी व्रत करने की तैयारी कर रहे हैं। लकड़हारे ने जिज्ञासा से पूछा कि इस व्रत से क्या लाभ होता है।
सेठ ने बताया कि इस व्रत को करने से धन में वृद्धि होती है और व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। सेठ से पूरी विधि जानकर लकड़हारे ने अपनी पत्नी के साथ श्रद्धा से षटतिला एकादशी का व्रत किया और तिल का दान भी किया। उस गरीब लकड़हारेने पूरे एक साल तक नियम से एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के पुण्य से उसकी गरीबी दूर हो गई और धीरे-धीरे वह काशी का एक धनवान सेठ बन गया। हे एकादशी माता, जैसे आपने गरीब लकड़हारे की इच्छा पूरी की, वैसे ही सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हों।
षटतिला एकादशी व्रत की दूसरी कथा
पौराणिक कहानी के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह रोज पूजा-पाठ करती थी और व्रत भी रखती थी, लेकिन कभी किसी को दान नहीं देती थी। भगवान विष्णु उसकी भक्ति से प्रसन्न थे, लेकिन उन्हें चिंता थी कि ब्राह्मणी पूजा के पुण्यफल से वैकुंठ लोक तो प्राप्त कर लेगी लेकिन अन्न दान के बगैर वहां वह भोजन कैसे प्राप्त करेगी इसी कारण एक दिन भगवान विष्णु भिक्षुक का रूप लेकर उसके घर पहुंचे। उन्होंने उससे भिक्षा मांगी, लेकिन ब्राह्मणी ने अन्न देने के बजाय एक मिट्टी का ढेला दे दिया।
कुछ समय बाद ब्राह्मणी का शरीर पूरा हो गया और उसे वैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई। वहां पहुंचकर उसे भोजन का अभाव होने लगा। दुखी होकर वह भगवान विष्णु के पास गई और कारण पूछा। तब भगवान विष्णु ने उसे उसकी भूल बताई और उपाय बताए हुए कहा - पहले तुम अपने घर जाओ। तुम्हें देखने के लिए देवस्त्रियाँ आएँगी। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लेना, तब द्वार खोलना।'
यह सुनकर वह ब्राह्मणी अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली - 'आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का महात्म्य मुझसे कहो।' उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।



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