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हज पर जाने से पहले जानिए, कैसे पूरा होता है हज का सफर..
हज का महीना चल रहा है और इस्लाम धर्म की बात की जाए तो हज करना सब मुसलमानों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद होता है। नमाज, रोजा और हज, हर मुसलमान पर फर्ज किए गए है।
यदि आपको भी हज का ये पाक महीना नसीब हुआ और आप हज पर जाने का तैयारी कर रहे है तो आज हम आपको बताएगें की आखिर कैसे पूरा किया जाता है हज। पढ़िए आगे.....

एहतराम है बेहद जरूरी
हाजी लोग हज यात्रा पर जाने से पहले अपने आपको पूरी तरह से एहतराम के साथ तैयार करते है। हाजियों को बिना सिला हुआ सफेद कलर का एक पोशाक ओढ़ना होता है तो वहीं महिलाएं भी सफेद कलर के एक कपड़े से अपने आप को पूरा ढ़ाक लेती है। हाजियों को किसी भी तरह के फैशन जैसे परफ्यूम, नेल पॉलिस या लड़ाई झगड़े से परहेज करना होता है

काबे के तवाफ से हज की शुरुआत
हज की शुरुआत मक्का शरीफ से होती है, जहां हाजी काबे के चारों तरफ घड़ी की उल्टी दिशा में सात बार चक्कर लगाते है। इस प्रक्रिया को तवाफ कहा जाता है। सात चक्कर लगाते है पहली प्रकिया पूरी हो जाती है।

आबे जमजम का पत्थर
इस्लामिक धर्मग्रंथों के अनुसार जब इब्राहीम की बीवी हाजरा गर्म रेगिस्तान में अपने शौहर के लिए पानी तलाश कर रही थी तब अल्लाह के करम से उनको इसी पत्थर से पानी निकलता हुआ मिला था, जिसे आबे जमजम कहा जाता है। इस पत्थर के सात चक्कर लगाकर हाजी अपनी अगली प्रक्रिया पूरी करते है।

उमरा खत्म, हज शुरु
अब तक हाजियों का उमरा खत्म हो चुका होता है। असल में तीन चरण पूरे करने बाद हज की शुरुआत होती है। हज की शुरुआत शनिवार के दिन से होती और इसके लिए हाजियों को 5 किलोमीटर दूर मीना मस्जिद पहुंचना होता है।

जबल उर रहमा
अगले दिन हाजी इस पहाड़ी के पास जमा होते हैं जिसे जबल उर रहमा कहते है। मीना मस्जिद से 10 किमी दूर इस पहाड़ी के चारों तरफ बैठकर हाजी नमाज भी अदा करते है।

मुजदलफा
शाम को सूरज ढ़लने के बाद हाजी अराफात पहाड़ी और मीना मस्जिद के बीच में बसे मुजदलफा जाते है। और यही वो जगह है जहां पर हाजी, शैतान को मारने वाली प्रक्रिया पूरी करने के लिए पत्थर इकट्ठा करते हैं।

ईद
सुबह होते ही ईद हाजियों का इंतजार कर रही होती है। वहां से लाए हुए पत्थर शैतान को मारने के साथ ही ईद के जश्न का आगाज हो जाता है। पत्थर मारने की रश्म रोजाना तीन बार अदा की जाती है।

कुर्बानी दी जाती है
पहली बार पत्थर मारने के बाद हाजियों के द्वारा बकरीद के दिन इब्राहीम को याद करते हुए बकरे हलाल किए जाते हैं और उसके गोस्त को गरीबों और जरूरतमंदो के बीच बांट दिया जाता है।

साफ सफाई की रश्म
इसके अगले दिन हाजी अपने पूरे बाल कटवाते हैं जबकि महिलाएं थोड़े से बाल काटकर इस रश्म को अदा करती है।

फिर से काबे का तवाफ
इस रश्म को पूरी करने के बाद हाजी दोबारा मक्का मस्जिद में लौटते हैं और काबे के सात चक्कर लगाते हैं।

पत्थर मारना
काबे के तवाफ के बाद एक बार फिर से हाजी मीना जाते हैं और अगले दो-तीन दिनों तक पत्थर मारने की रस्म अदायगी करते हैं।

आखिर में फिर काबा जाते हैं हाजी
इन सारी रश्मों के पूरा हो जाने के बाद अपने वतन लौटने से पहले एक बार फिर काबे की तरफ हाजियों को तवाफ करना होता है। यहां आकर आखिर में लोग फिर से काबा जाते हैं और उसके सात चक्कर लगाते हैं। इसके साथ ही हज का सफर पूरा हो जाता है।



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