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Datta Jayanti 2021 : दत्तात्रेय भगवान के पूजन से मिलेगा त्रिदेवों का आशीर्वाद, इस कथा से जानें इसका कारण
हिन्दू पंचांग के हर माह कोई न कोई महत्वपूर्ण पर्व एवं त्यौहार आता है, उन्हीं में से एक है दत्ता जयंती। दत्ता जयंती को दत्त पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान दत्तात्रेय की पूजा अर्चना की जाती है। इसी दिन भगवान दत्तात्रेय का अवतरण हुआ था। उन्हें एक समधर्मी देवता माना जाता है और साथ ही उन्हें त्रिमूर्ति कहा जाता है क्योंकि वे ब्रम्हा, विष्णु और महेश के अवतार थे। दत्ता जयंती महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के क्षेत्रों में बड़ी ही धूम धाम से मनाई जाती है। तो चलिए जानते हैं दत्ता जयंती की तिथि, पूजा विधि और इससे जुड़ी कथा के बारे में।

दत्ता जयंती 2021 की तिथि
दत्त जयंती या दत्त पूर्णिमा अगहन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस वर्ष यह 18 दिसंबर को पड़ने वाली है। पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 18 दिसंबर को सुबह 07:24 बजे से होगा और समापन 19 दिसंबर की सुबह 10:05 बजे होगा।

दत्तात्रेय जयंती की पूजन विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से मुक्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। उसके बाद पूजा की तैयारी करें। सबसे पहले एक चौकी पर गंगाजल छिड़क कर उस पर आसन बिछाएं। इसके बाद भगवान दत्तात्रेय की तस्वीर को स्थापित करें। इसके बाद भगवान दत्तात्रेय को फूल माला चढ़ाएं, फूल अर्पित करें और दीपक जलाएं। फिर भगवान की विधिवत पूजा करें और आरती गाएं। अंत में प्रसाद का वितरण करें।

भगवान दत्तात्रेय जयंती की कथा
महर्षि अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के उद्देश्य से ब्रह्मा, विष्णु, महेश पृथ्वी लोक पहुंचे। तीनों देव साधु भेष धारण कर अत्रि मुनि के आश्रम पहुंचे और माता अनसूया के सम्मुख भोजन करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु तीनों देवताओं ने यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराएं। इस पर माता अनसूया असमंजस में पड़ गई।
जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। इसके बाद माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से जल निकालकर तीनों साधुओं पर छिड़का और वे तीनों साधू तुरंत छह माह के शिशु बन गए। तब माता ने देवताओं को शर्तानुसार भोजन कराया।
तीनों देवताओं के शिशु बन जाने पर पार्वती, सरस्वती और लक्ष्मी देवियां पृथ्वी लोक में पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। आगे चलकर तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया। तभी से माता अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है और भगवान दत्तात्रेय के जन्म अवतरण तिथि को दत्ता जयंती के रूप में मनाया जाता है।



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