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हरियाली तीज पर मिलेगा मनचाहा वर, जानिए कैसे?
कहा जाता है कि अगर कुंवारी कन्या सच्चे मन से माता पार्वती की पूजा करें तो उन्हें मनचाहा वर मिलता है।
हर साल आने वाले तीज के त्योहारों में से एक है हरियाली तीज या श्रावणी तीज। ये पर्व उत्तर भारत के सभी राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में मनाया जाता है।
यह त्यौहार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीय को मनाया जाता हैं। महिलाएं आस्था, श्रद्धा और उत्साह से इस त्योहार को मनाती है। नवविवाहिताएं इस दिन अपने शादी का जोड़ा पहनती हैं। राजस्थान में इस दिन पर खासतौर पर पारम्पारिक परिधानों में से एक लहरिया पहना जाता है। इस दिन सुहागन महिलाएं भगवान शिव और माता गौरी से अपने पति की लम्बी आयु की कामना के लिए पूजा करती है वहीं कुंवारी लड़किया अच्छे वर की कामना करने के लिए इस दिन व्रत किया करती है।

कहा जाता है कि अगर कुंवारी कन्या सच्चे मन से माता पार्वती की पूजा करें तो उन्हें मनचाहा वर मिलता है।

माता पार्वती की आराधना करने
ऐसी मान्यता है कि मां पार्वती ने 107 जन्म लिए थे, भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए। इसलिए मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इन दोनों के मिलन के मौके को हरियाली तीज के रुप में मनाया जाता है, तभी से इस व्रत की शुरूआत हुई। इस दिन जो सुहागन स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं उनका सुहाग लंबे समय तक बना रहता है। कहते है कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर पाने के लिए इस दिन माता पार्वती की विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।

कथा सुनने का महत्त्व
इस दिन शिव पार्वती की कथा सुननी ज़रूरी है। महिलाएं माता पार्वती से अपने पति की लम्बी आयु की कामना करती हैं। इसके बाद घर में उत्सव मनाया जाता है।

निर्जला व्रत रखती है महिलाएं
इस दिन स्त्रियों के मायके से श्रृंगार का सामान तथा मिठाइयां ससुराल में भेजी जाती है। हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह घर के काम काज करके स्नान आदि करने के बाद सोलह श्रृंगार कर पूरे दिन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। जिन लड़कियों की सगाई हो जाती है वे होने वाले पति की दीर्घ आयु के लिए भी इस व्रत को रख सकती हैं।

सावन से जुड़े है झूले
पार्वतीजी का आशीष पाने के लिए महिलाएं कई रीति-रिवाजों का पालन करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने मायके जाकर ये त्योहार मनाती हैं। इस दिन मान्यता है कि महिलाएं झूलों पर बैठकर अपने आराध्य देवी-देवताओं की नकल करती हैं। झूले इस त्योहार का अभिन्न हिस्सा है। यह त्योहार कुछ मौज-मस्ती का वक्त है, इस वजह से पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं।



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