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महाशिवरात्रि: केतकी पुष्प ने दी थी झूठी गवाही, इसलिए शिव पूजा में इसके प्रयोग की है मनाही, जानें पूरी कहानी
महाशिवरात्रि का दिन भगवान भोलेनाथ को समर्पित है। इस दिन भक्त उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा अर्चना करते हैं और उपवास रखते हैं। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त उन्हें बेलपत्र, धतूरा, जल आदि चढ़ाया जाता है। भगवान शिव की पूजा में कुछ चीजों के प्रयोग की सख्त मनाही होती है। उन वर्जित चीजों के इस्तेमाल से भोलेनाथ का प्रकोप भी झेलना पड़ सकता है। भगवान शिव की पूजा में केतकी के फूलों का इस्तेमाल पूर्ण रूप से वर्जित है और इस कथा के माध्यम से जानते हैं आखिर इसकी वजह क्या है।

भगवान शिव ने क्यों त्याग दिए केतकी के फूल?
इस सवाल का जवाब शिवपुराण में बताया गया है। शिवपुराण की इस कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्माजी में इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया कि दोनों में से श्रेष्ठ और बड़ा कौन है। सृष्टि के रचियता होने के कारण ब्रह्माजी खुद को श्रेष्ठ बताते तो उधर भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ बता रहे थे।
तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। अब दोनों देवताओं ने आपसी सहमती से ये फैसला किया कि जो इस लिंग के छोरका पता पहले लगा लेगा, वो ही श्रेष्ठ माना जाएगा।

अब दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूंढने निकल पड़े। विष्णु जी को छोर नहीं मिल पाया और वो लौट आएं। ब्रह्माजी को भी सफलता नहीं मिली लेकिन उन्होंने विष्णु जी से आकर कहा कि वो छोर तक पहुंच गए थे। और उन्होंने केतकी के फूल का इसका साक्षी बताया।
ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भोलेनाथ वहां प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की। दोनों देवताओं ने शिवजी की स्तुति की तब महादेव बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूं। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है।
इसके बाद शिवजी ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि वह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं होंगे। यही वजह है कि शिव की पूजा में केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।



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